भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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४२ फलदीपिका बृहस्पति—ज्योतिषी, मन्त्री, गुरु, ब्राह्मण, सन्यासी¹, मुख्य पुरुष, कबूतर, घोड़ा, हंस । शुक्र—गाने वाला, धनी, वैश्य (सौदागर), व्यभिचारी या कामी पुरुष, नट, कपड़ा बुनने वाला, वेश्या, मोर, गाय, भैंस, तोता । शनि—तेल बेचने व खरीदने वाला, नौकर, नीच पुरुष, शिकारी, लुहार, हाथी, कौआ, कोयल । राहु केतु—बौद्ध, सांप पकड़ने वाला, गधा, मेंढ़ा, भेड़िया, ऊंट, सांप, मच्छर, खटमल, कीड़े मकोड़े, उल्लू, ऐसा स्थान जहां अन्धेरा रहता हो । ऊपर जो विविध ग्रहों से सम्बन्धित जानवर, पदार्थ, व्यवसाय, वस्त्र या स्थान का उल्लेख किया गया है इसको विस्तारपूर्वक समझाने के लिये बहुत स्थान चाहिये केवल एक उदाहरण देकर इसका उपयोग बताया जाता है । मान लीजिये किसी व्यक्ति की जन्मकुण्डली में बलवान् शुक्र की महादशा प्रारंभ हो रही हो तो ऊपर जो शुक्र से सम्बन्धित--शुक्र के व्यक्ति किंवा वस्तु का निर्देश किया गया है उनसे लाभ होगा । अनेक वस्तुओं में से किस से ? यदि देहात का रहने वाला खेतिहर है तो सम्भवतः गायों से लाभ हो जाय—यदि बम्बई में रहने वाला सिनेमा लाइन का बड़ा डाइरेक्टर है तो वेश्याओं को नौकर रखकर नवीन चलचित्र बनाने से लाभ हो जावे । यह सब ग्रह के साथ-साथ परिस्थिति और सम्भावना देखकर कहना चाहिये ॥ १७-२० ॥ सौम्यः समोऽर्कजसितावहितौ खरांशो- रिन्दोर्हितौ रविबुधावपरे समाः स्युः । भौमस्य मन्दभृगुजौ तु समौ रिपुर्ज्ञः सौम्यस्य शीतगुररिः सुहृदौ सितार्कौ ॥२१॥ १. बहुत-से टीकाकार मुख्य सन्यासी यह अर्थ करते हैं परन्तु हम उनसे सहमत नहीं ।