फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
DevanagariHindipublished684 पृष्ठ
पृष्ठ 44, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 44
दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ४३ सुरेद्धिषौ कविबुधौ रविजः समः स्या- न्मध्यौ कवेर्गुरुकुजौ सुहृदौ शनिज्ञौ । जीवः समः सितविदौ रविजस्य मित्रे ज्ञेया अनुक्तखचरास्तु तदन्यथा स्युः ॥२२॥ इन दो श्लोकों में यह बताया गया है कि किस ग्रह के कौन मित्र हैं; कौन शत्रु हैं और कौन से न शत्रु न मित्र । जो न मित्र होते हैं न शत्रु होते हैं उन्हें ज्योतिष में "सम" कहते हैं ।
| ग्रह | मित्र | सम | शत्रु |
|---|---|---|---|
| सूर्य | चं० मं० वृ० | बु० | शु० श० |
| चन्द्र | सू० बु० | मं० वृ० शु०श० | |
| मंगल | सू० चं० वृ० | शु० श० | बु० |
| बुध | सू० शु० | मं० वृ० श० | चं० |
| बृहस्पति | सू० चं० मं० | श० | बु० शु० |
| शुक्र | बु० श० | मं० वृ० | सू० चं० |
| शनि | बु० शु० | वृ० | सू० चं० मं० |
| यह नैसर्गिक मैत्री चक्र है अर्थात् स्वभाव से कौन ग्रह किसका मित्र | |||
| होता है कौन किसका शत्रु आदि । अब आगे के श्लोक में यह बतावेंगे कि | |||
| किसी जन्मकुण्डली में कोई दो ग्रह आपस में मित्र हैं या शत्रु यह कैसे | |||
| देखना ॥ २१-२२ ॥ | |||
| अन्योन्यं त्रिसुखस्वलान्त्यभवगास्तत्कालमित्राण्यमी | |||
| तन्नैसर्गिकमप्यवेक्ष्य कथयेत्तस्यातिमित्राहितान् । | |||
| शौर्याज्ञे रविजो गुरुर्गुरुसुतौ भौमश्चतुर्थाष्टमौ | |||
| पूर्णं पश्यति सप्तमं च सकलास्तेष्वंध्रिवृद्ध्या क्रमात् ॥२३॥ | |||
| ऊपर नैसर्गिक या स्वाभाविक मैत्री बतलाने के बाद अब तात्कालिक |