फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 39, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ फलदीपिका हैं, थोड़े केश (सिर के बाल) होंगे । इसकी आकृति रक्त-श्याम (कुछ स्याही लिये हुए लाल) होती है । इसके नेत्र की पुतलियाँ शहद की तरह कुछ भूरापन और ललाई लिये हुए; इसकी आकृति चौकोर है; इसकी भुजायें विशाल हैं; यह लाल वस्त्र धारण किये हुए है; स्वभाव ' से सूय शूर और प्रचण्ड है ॥ ८ ॥ चन्द्रमा का स्थूल (बड़ा) शरीर है । वह युवावस्था का भी है और प्रौढ़ावस्था का भी है; उसका शरीर सफेद और कमजोर¹ है; उसके सिर के केश सूक्ष्म और काले हैं; उसके नेत्र बहुत सुन्दर हैं; उसके शरीर में रक्त की प्रधानता है; अर्थात् शरीर रक्त-प्रवाह पर चन्द्रमा का आधिपत्य है । चन्द्रमा की वाणी मृदु है और गौर वर्ण वाला सफ़ेद वस्त्र पहनने वाला है । यह मृदु (मुलायम) है—शरीर से भी, स्वभाव से भी । त्रिदोषों में कफ और वात पर इसका विशेष अधिकार है अर्थात् चन्द्रमा अपनी अन्तर्दशा में वात रोग या कफ रोग या वातकफात्मक रोग उत्पन्न करेगा ॥ ९ ॥ मंगल मध्य में कृश है अर्थात् उसकी पतली कमर है; इसके सिर के केश घुंघराले और चमकीले हैं; इसकी दृष्टि में क्रूरता है और स्वभाव से भी उग्र बुद्धि है । यह पित्त प्रधान है । लाल वस्त्र धारण किये हुए और इसके शरीर का भी वर्ण लाल ही है । यह स्वभाव से प्रचण्ड है किन्तु अति उदार है; शरीर के मज्जा भाग पर इसका विशेष अधिकार है (इसका आशय यह हुआ कि जिसकी जन्मकुण्डली में मंगल बलवान् है उसके शरीर की मज्जा बलवान् होगी; जिसका मंगल निर्बल है उसकी मज्जा निर्बल होगी) मंगल तरुण अवस्था का है (इसका आशय यह हुआ कि यदि किसी मनुष्य की जन्मकुण्डली में बलवान् मंगल लग्न में १. चन्द्रमा को स्थूल भी कहा है; कृश भी कहा है; प्रतीत होता है पक्ष बल अधिक होने से स्थूल शरीर होगा, पक्ष बल कम होने से कृश शरीर होगा ।