भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ३५ पीतद्युतिः पिङ्गरुचेक्षणः स्यात् पीनोन्नतोराश्च बृहच्छरीरः । कफात्मकः श्रेष्ठमतिः सुरेड्यः सिंहाब्जनादश्च वसुप्रधानः ॥१२॥ चित्राम्बराकुञ्चितकृष्णकेशः स्थूलाङ्गदेहश्च कफानिलात्मा । दूर्वाङ्कुराभः कमनो विशालनेत्रो भृगुः साधितशुक्लवृद्धिः ॥१३॥ पङ्गुर्निम्नविलोचनः कृशतनुर्दीर्घः सिरालोऽलसः कृष्णाङ्गः पवनात्मकोऽतिपिशुनः स्नाय्वात्मको निर्घृणः । मूर्खः स्थूलनखद्विजः परुषरोमाङ्गोऽशुचिस्तामसो रौद्रः क्रोधपरो जरापरिणतः कृष्णाम्बरो भास्करिः ॥१४॥ अब प्रत्येक ग्रह का स्वरूप और उसकी प्रकृति बताते हैं। इसका प्रयोजन क्या है ? यदि लग्न में कोई ग्रह हो तो उसी ग्रह के गुण और प्रकृति के अनुसार जातक की प्रकृति होती है । जिसके लग्न में मंगल है उसकी प्रकृति में उग्रता, साहस, रणप्रियता आदि गुण आवेंगे । किस राशि में स्थित होकर लग्न में मंगल है इसका भी बहुत प्रभाव पड़ेगा । यदि बलवान् मंगल है तो शूरवीर सेनापति होकर लड़ सकता है, यदि दुर्बल पाप पीड़ित मंगल है तो कुंजड़ों की-सी लड़ाई मोल ले सकता है । जब लग्न में कोई ग्रह नहीं होता है तो लग्नेश की तरह मनुष्य की आकृति, प्रकृति, गुण, स्वभाव आदि होते हैं । इस कारण प्रत्येक ग्रह की प्रकृति, स्वभाव आदि जानना आवश्यक है । जो ग्रह लग्न को देखते हैं वह भी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार जातक को प्रभावित करते हैं । इसके अतिरिक्त जो ग्रह रोग पीड़ित या बीमार करता है उसी ग्रह की प्रकृति और दोष जनित रोग होगा । उदाहरण के लिये सूर्य पित्त रोग करेगा तो शनि वायु रोग । इन्हीं सब बातों को समझने के लिये सातों ग्रहों के गुण, प्रकृति, स्वभाव आदि नीचे बताये जाते हैं । सूर्य की पित्त प्रकृति होती है, इसकी अस्थियाँ (हड्डियाँ) दृढ़ होती