फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ फलदीपिका कई ज्योतिषियों ने यह बताया था कि सूर्य सप्तमेश है इस कारण सूर्य की महादशा लगने पर विवाह होगा किन्तु हमने शुक्र स्त्री कारक होता है इस आधार पर शुक्र में ही विवाह कहा था और हमारा फलादेश ठीक बैठा। कहने का तात्पर्य यह है कि केवल भावेश के भंवर में पड़कर भूल में न पड़ना चाहिये। किसी भी स्थान का स्वामी बृहस्पति हो और यदि अच्छे स्थान पर पड़ा है और उसकी अन्तर्दशा है तो मनुष्य की युवावस्था में सन्तान दे जावेगा या सन्तान सम्बन्धी सुख देगा। शुक्र अच्छा पड़ा हो तो स्त्री सम्बन्धी विलास देगा ॥ ६ ॥ आयु, मरण, भय, पतन (किसी ऊंचे स्थान से गिरना या सम्मान- च्युत होना, जातिच्युत आदि होना), अपमान, बीमारी, दुःख, दरिद्रता, बदनामी, पाप, मज़दूरी, अपवित्रता, निन्दा, आपत्ति, कलुषता (मन का साफ न होना, निन्दा, निन्दित कर्म आदि) आपत्ति, मरने का सूतक, स्थिरता, नीच व्यक्तियों का आश्रय, भैंस, तन्द्रा (आलस्य, ऊँघना) कर्ज़, लोहे की वस्तु, नौकरी, दासता, जेल जाना, गिरफ्तार होना, खेती के साधन आदि का विचार शनि महाराज से करें । ७ ॥ पित्तास्थिसारोऽल्पकचश्च रक्तश्यामाकृतिः स्यान्मधुपिङ्गलाक्षः । कौसुम्भवासाश्चतुरस्रदेहः शूरः प्रचण्डः पृथुबाहुरर्कः ॥८॥ स्थूलो युवा च स्थविरः कृशः सितः कान्तेक्षणश्चासितसूक्ष्ममूर्धजः । रक्तैकसारो मृदुवाक् सितांशुको गौरः शशी वातकफात्मको मृदुः ॥ मध्ये कृशः कुञ्चितदीप्तकेशः क्रूरेक्षणः पैत्तिक उग्रबुद्धिः । रक्ताम्बरो रक्ततनुर्महीजश्चण्डोऽत्युदारस्तरुणोऽतिमज्जः ॥१०॥ दूर्वालताश्यामतनुस्त्रिधातुमिश्रः सिरावान्मधुरोक्तियुक्तः । रक्तायताक्षो हरितांशुकस्त्वक्सारो बुधो हास्यरुचिः समाङ्गः ॥