भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 684 में से

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दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ५१ राहु की भी अवस्था १०० कही गयी है। जहां सौ वर्ष की संख्या बतायी गई.है वहां पूरे सौ वर्ष न समझकर अति वृद्ध समझना चाहिये । चोरी आदि के प्रश्न के फलादेश में जो चिह्न (लाँछन या लहसन) शरीर का भाग और अवस्था आदि बतायी गई है उससे सहायता मिल सकती है । नीलद्युतिर्दीर्घतनुः कुवर्णः पामी सपाषण्डमतः सहिक्कः । असत्यवादी कपटो च राहुः कुष्ठी परान्निन्दति बुद्धिहीनः ॥३३॥ रक्तोग्रदृष्टिर्विषवागुदग्रदेहः सशस्त्रः पतितश्च केतुः । धूम्रद्युतिर्धूमप एव नित्यं व्रणाङ्किताङ्गश्च कृशो नृशंसः ॥३४॥ सीसं च जीर्णवसनं तमसस्तु केतो- मृद्भाजनं विविधचित्रपटं प्रदिष्टम् । मित्राणि विच्छनिसितास्तमसोर्द्वयोस्तु भौमः समो निगदितो रिपवश्च शेषाः ॥३५॥ अब राहु केतु का कुछ विशेष परिचय देते हैं । राहु का दीर्घ शरीर है, नीला रंग है, इसकी म्लेच्छ जाति, शरीर में खुजली या चर्म रोग है यह अधार्मिक, पाखण्डमति है । इसको हिचकियां आती हैं, झूठ बोलता है । कपटी है, कोढ़ी है, बुद्धिहीन है और दूसरों की निन्दा करता है । केतु की आंखें लाल और उग्र हैं, उसकी वाणी में विष है, ऊंचा शरीर, शस्त्र धारण किये है, धुयें का-सा उसके शरीर का रंग है और सदैव धूम्रपान, (सिगरेट पीना) आदि करता रहता है । उसके शरीर में व्रणों (घावों) के निशान हैं। शरीर से कृश है परन्तु स्वभाव से क्रूर और अत्याचार करने वाला है । यह जाति से भी पतित है । इन लक्षणों का प्रयोजन क्या ? यदि किसी मनुष्य के द्वितीय स्थान में केतु हो तो वह कठोर वचन बोलने वाला होगा । यदि राहु की अन्तर्दशा में किसी व्यक्ति

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