भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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५२ फलदीपिका का अहित हुआ है तो आप कह सकते हैं कि "दूसरे की निन्दा करने के कारण" यह अनिष्ट हुआ है। जब अनेक लक्षण बताये जाते हैं तो परिस्थिति का विचार कर लक्षण विशेष से फलादेश का विचार किया जाता है यह ज्योतिषियों का सम्प्रदाय है । राहु का धातु सीसा है और पुराने (जीर्ण) कपड़ों पर इसका आधिपत्य है। केतु का मिट्टी का बर्तन और धब्बेदार कपड़ा। केतु, राहु के मित्र बुध, शुक्र, शनि हैं। मंगल न मित्र है और न शत्रु । सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति इनके शत्रु हैं। मूढोऽपि नीचरिपुगोऽष्टमषड्व्ययस्थो दुःस्थः स्मृतो भवति सुस्थ इतीतरः स्यात् । यदि कोई ग्रह अस्त हो, नीच राशि में या नीच अंश (नवांश) में हो, शत्रु राशि में हो या लग्न से छठे, आठवें, बारहवें स्थान में हो तो उसे दुःस्थ (ख़राब जगह में स्थित) कहते हैं। यदि ऊपर जो स्थान बताये गये हैं उनके अलावा स्थानों में हो तो उसे सुस्थ (अच्छी जगह वाला) कहते हैं। चन्द्रे व्ययायतनुषट्सुतकामसंस्थे तोयाभिवृद्धिमिह शंसति वृद्धिकार्ये॥३६॥ यदि जल¹ के विषय में कोई प्रश्न किया और चन्द्रमा प्रथम, पञ्चम, छठे, सातवें, ग्यारहवें या बारहवें स्थान में हो तो जल वृद्धि होगी । यह फलादेश करना चाहिये । १. बांध बंधवाना, कुंआ खुदवाना आदि । अस्त—जब कोई ग्रह सूर्य के इतने समीप हो कि सूर्य के प्रकाश के कारण दिखलाई न दे तो उसे अस्त कहते हैं। चन्द्रमा सूर्य से १२ अंश दूर तक (सूर्य के अंश चन्द्रमा के अंशों से १२ अंश कम हों या अधिक) तक अस्त रहता है यह अमावस्या तथा शुक्ल पक्ष की पड़वा को होता है । मंगल सूर्य से १७ अंश की दूरी तक अस्त रहता है। यदि बुध मार्गी हो तो सूर्य से १४