भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 684 में से

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दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ५३ अन्तः सारसमुन्नतद्रुररुणो वल्ली सितेन्दू स्मृतौ गुल्मः केतुरहिश्च कण्टकनगौ भौमार्कजौ कीर्तितौ । वागीशः सफलोऽफलः शशिसुतः क्षीरप्रसूनद्रुमौ शुकेन्दू विधुरोषधिः शनिरसारागश्च सालद्रुमः ॥३७॥ किस ग्रह का किस प्रकार के वृक्षों पर विशेष आधिपत्य है, यह नीचे बताया जाता है। जो वृक्ष ऊँचे हों और अन्तःसार (जिनके भीतर कठोरता या दृढ़ता हो) उन पर सूर्य का विशेष अधिकार होता है। लता, वल्ली आदि पर चन्द्रमा और शुक्र का, गुल्मों और झाड़ियों पर राहु और केतु का विशेष अधिकार है। कांटेदार वृक्षों पर शनि और मंगल का। फलदार वृक्ष बृहस्पति के वर्ग में हैं। बिना फल के वृक्षों पर बुध का अधिकार है। जितने वृक्ष पुष्पों से युक्त हों या जिनमें रस हो (वृक्षों से जो दूध निकलता है) उनको शुक्र और चन्द्रमा के हिस्से में समझना चाहिये। औषधियों (जड़ी बूटियों का) का स्वामी चन्द्रमा है। जिन वृक्षों में रस विशेष न हों और कमजोर हों उन पर शनि का विशेष प्रभाव समझिये। साल के वृक्षों पर राहु का आधिपत्य है। किसी-किसी का ऐसा भी मत है कि फल वाले वृक्षों पर बृहस्पति का, पुष्प बहुल वृक्षों पर शुक्र का और पत्र बहुल वृक्षों पर बुध का आधिपत्य समझना चाहिए। वैसे तो प्रत्येक वृक्ष में पत्र, पुष्प, फल आदि होते हैं परन्तु उस वृक्ष में प्रधानता किसकी है यह देखना चाहिये। कटहल में फलों की प्रधानता है, मौलश्री में पुष्प की प्रधानता है और अशोक में पत्ते की प्रधानता है। अंश की दूरी तक अस्त रहता है! यदि बुध वक्री हो तो १२ अंश की दूरी तक अस्त होता है। बृहस्पति सूर्य से ११ अंश दूर तक अस्त होता है। शुक्र यदि मार्गी हो तो सूर्य से १० अंश तक अस्त; किन्तु यदि शुक्र वक्री हो तो सूर्य से ८ अंश तक अस्त। सूर्य के जितने अंश हो उनसे १५ अंश पहिले और १५ अंश बाद तक शनि अस्त होता है।

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