फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय : ग्रह भेद ४९ सूर्य गेहूँ कलिंग माणिक चन्द्रमा चावल यवन स्वच्छ मोती मंगल मसूर अवन्ती मूंगा बुध मूंग मगध पन्ना बृहस्पति चना सिन्धु पुखराज शुक्र श्याम मूंग¹ कीकट हीरा शनि तिल सौराष्ट्र नीलम राहु उड़द अम्बर गोमेद केतु कुल्थी पर्वत लहसनिया भारतवर्ष एक महान् देश है, देश के किस भाग में मनुष्य की उन्नति होगी ? जो ग्रह कुण्डली में बलवान् हो वह जिस प्रदेश का, अधिष्ठाता है उसमें विशेष अभ्युदय की आशा है। जो ग्रह कुण्डली में निर्बल या पीड़ित है, उससे सम्बन्धित देश में मनुष्य का उत्थान नहीं होगा। अन्न विशेष का फलित में उपयोग यही होता है कि पीड़ा कारक ग्रह की दशा-अन्तर्दशा या अनिष्ट गोचर काल में उस ग्रह से सम्बन्धित अन्न का दान करना चाहिये ॥ २८-२९ ॥ ताम्रं कांस्यं धातुताम्रं त्रपु स्यात् स्वर्णं रौप्यं चायसं भास्करादेः । वस्त्रं तत्तद्वर्णयुक्तं विशेषाज्जीर्णं मन्दस्याग्निदग्धं कुजस्य ॥३०॥ भानोः कटुर्भूमिसुतस्य तिक्तं लावण्यमिन्दोरथ चन्द्रजस्य । मिश्रीकृतं यन्मधुरं गुरोस्तु शुक्रस्य चाम्लं च शनेः कषायः ॥ अब ग्रहों के धातु, वस्त्र विशेष तथा भोजन के किस प्रकार के स्वाद का कौन-सा ग्रह अधिष्ठाता है, यह बताया जाता है। १. श्याम मूंग या काले मूंग से किस अन्न से तात्पर्य है यह समझ में नहीं आता। अन्य ज्योतिष के ग्रंथों में शुक्र का अन्न श्वेत चावल लिखा है।