फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ फलदीपिका आचार्यदैवतपितॄन् शुभपूर्वभाग्य- पूजातपःसुकृतपौत्रजपार्यवंशान् ॥१४॥ व्यापारास्पदमानकर्मजयसत्कीर्तिं क्रतुं जीवनं व्योमाचारगुणप्रवृत्तिमनन्याज्ञां च मेषूरणम् । लाभायागमनाप्तिसिद्धिविभवान् प्राप्तिं भवं श्लाघ्यतां ज्येष्ठभ्रातरमन्यकर्णसरसान् सन्तोषमाकर्णनम् ॥१५॥ दुःखांघ्रिवामनयनक्षयसूचकान्त्य- दारिद्र्यपापशयनव्ययरिःफबन्धान् । भावाह्वया निगदिताः क्रमशोऽथ लीन- स्थानं त्रिषड्व्ययपराभवराशिनाम ॥१६॥ जन्मकुंडली में १२ भाव होते हैं । एक-एक भाव को अनेक नाम से पुकारते हैं । किस-किस भाव के कितने और क्या-क्या नाम हैं, यह नीचे बताया जाता है । इसका प्रयोजन यह है कि एक ही भाव के भिन्न-भिन्न नामों से यह पता चलता है कि उस एक ही भाव से किन-किन भिन्न-भिन्न चीज़ों का विचार करना । (१) लग्न, होरा, कल्प (प्रभात, सूर्योदय अर्थात् प्रारंभ) देह, उदय (प्रारंभ होना), रूप, सिर, वर्तमान काल (मौजूदा हालत), जन्म इन सब का विचार पहले घर (भाव) से करें । (२) धन, विद्या, अपनी वस्तु (धन पर अधिकार), खाना पीना, भोजन, दाहिना नेत्र, चेहरा, पत्रिका (चिट्ठी), वाणी (बोलने की शक्ति), कुटुम्ब—यह द्वितीय घर के नाम हैं अर्थात् इन सब का विचार द्वितीय भाव से करें । (३) दुश्चिक्य, छाती, दाहिना कान, सेना, हिम्मत, वीरता, शक्ति तथा भाई (बहिनों) का विचार तृतीय से करें । इसको दुश्चिक्य स्थान भी कहते हैं ।