फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ फलदीपिका अब राशियों के कुछ अन्य लक्षण बतलाते हैं-- मेष चर द्वार धातु क्रूर विषम पूर्व वृष स्थिर बहिः मूल सौम्य सम दक्षिण मिथुन उभय गर्भ जीव क्रूर विषम पश्चिम कर्क चर द्वार धातु सौम्य सम उत्तर सिंह स्थिर बहिः मूल क्रूर विषम पूर्व कन्या उभय गर्भ जीव सौम्य सम दक्षिण तुला चर द्वार धातु क्रूर विषम पश्चिम वृश्चिक स्थिर बहिः मूल सौम्य सम उत्तर धन उभय गर्भ जीव क्रूर विषम पूर्व मकर चर द्वार धातु सौम्य सम दक्षिण कुंभ स्थिर बहिः मूल क्रूर विषम पश्चिम मीन उभय गर्भ जीव सौम्य सम उत्तर चर का अर्थ है जिसमें कार्य जल्दी हो। यात्रा करे तो जल्दी वापिस आवे। स्थिर लग्न में कार्य करने से स्थायी होता है। स्थिर लग्न में मकान में प्रवेश करे तो बहुत वर्षों तक रहे। 'उभय' का पहिला आधा भाग 'स्थिर' का प्रभाव दिखाता है; अन्तिम आधा भाग 'चर' का प्रभाव दिखाता है। मिला-जुला प्रभाव दिखाने के कारण इसे उभय (दोनों) कहते हैं। 'द्वार' का अर्थ है दरवाजे पर। 'बहिः' का अर्थ है बाहर। 'गर्भ' का अर्थ है अन्दर। 'धातु' का अर्थ है सोना, चांदी, लोहा आदि। 'मूल' का वृक्ष, फल, अन्न, खेती आदि। 'जीव' का अर्थ है प्राणी—पुत्र, पौत्र आदि। मान लीजिये ग्रह के लक्षण से प्रतीत होता है कि 'लाभ' होगा? किसका लाभ? जिस राशि में ग्रह है उसके लक्षण से बतलाइये कि किस प्रकार के लाभ या हानि की संभावना है। धातु की, या मूल की या मनुष्य की। क्रूर राशि में क्रूर ग्रह और भी क्रूर हो जाता है। सौम्य राशि में क्रूर ग्रह कम क्रूरता दिखाता है। इस प्रकार ग्रह की तथा राशि की क्रूरता तथा सौम्यता निश्चय कर परिणामतः कितनी क्रूरता या सौम्यता होगी यह