फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम अध्याय : राशि भेद १९ ज्ञात कर, भाव स्पष्ट करके और ग्रहों तथा भावों के बल निकालकर फल कहे। ॥ ३ *॥ शिरोवक्त्रोरोहृज्जठरकटिवस्तिप्रजनन- स्थलान्यूरूबान्वोर्युगलमिति जंघे पदयुगम् । विलग्नात्कालाङ्गान्यलिक्षषकूलीरान्तिममिदं भसन्धिविख्याता सकलभवनान्तानपि परे ॥ ४ ॥ समस्त जन्मकुंडली को 'कालपुरुष, का स्वरूप मानकर प्रथम भाव¹ से सिर का, दूसरे भाव से चेहरे का, तीसरे से छाती का, चौथे से हृदय का, पांचवें से पेट का, छठे से कमर का, सातवें से वस्ति² का, आठवें से गुप्त इन्द्रियों का, नवें से जांघों का, दसवें से दोनो घुटनों का, ग्यारहवें से पिंडलियों का, बारहवें से दोनों पैरों का विचार करना चाहिये। जिस भाव में शुभ ग्रह हों, जिस भाव को शुभ ग्रह देखते हों, जिस भाव का स्वामी बलवान् हो—उस भाव से सम्बन्धित शरीर का भाग पुष्ट और सुन्दर होता है। भावेश निर्बल होने से या भाव के क्रूर दृष्ट, क्रूर युत होने से, उस भाव से सम्बन्धित शरीर का भाग कृश या रोगयुक्त होता है। कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशियों के अन्तिम भाग (अंश) को राशि- संधि कहते हैं। अन्य मत से किसी भी राशि का अंतिम भाग—जहां अग्रिम राशि शुरू होती हो—राशिसन्धि कहलाता है ॥ ४ ॥ अरण्ये केदारे शयनभवने श्वभ्रसलिले गिरौ पाथः सस्यान्वितभुवि विशां धाम्नि सुषिरे । १. भाव, स्थान, घर सब का एक ही अर्थ है। २. नाभि से लिंग मूल तक एक रेखा खींची जावे और उसे दो भागों में विभाजित किया जावे तो नीचे का आधा हिस्सा वस्ति कहलाता है।