भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

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१८ फलदीपिका गति कभी दक्षिणायन होती है, हमको अपरिमित (जिसकी सीमा नहीं) श्री (धन, वैभव, सौभाग्य, सौन्दर्य आदि) प्रदान करें । ध्रुव लोक में देवताओं का वास माना गया है—वहां छः महीने का दिन, छः महीने की रात्रि होती है । पितरों का वास चन्द्रलोक में माना गया है—चन्द्रमा पर सूर्य का प्रकाश आधे मास तक (शुक्ल पक्ष में) रहता है, कृष्ण पक्ष पितरों का माना गया है । मनुष्यों की निवास भूमि— पृथ्वी में, दिन रात के आधे समय (१२ घंटे) सूर्य का प्रकाश रहता है—यह तीनों बातें ऊपर की स्तुति में प्रदर्शित की गई हैं । ॥ १ ॥ वाग्देवी (वाणी की अधिष्ठात्री सरस्वती), कुल देवता तथा तीनों काल (भूत, वर्तमान, भविष्य) का ज्ञान प्रदान करने वाले मेरे गुरुओं को, तथा सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु इन नवग्रहों को, श्री गणेशजी तथा ईश्वर (भगवान् शंकर) को भक्तिपूर्वक प्रणाम करके महर्षि अत्रि, महर्षि पराशर आदि कथित शास्त्र (फलित ज्योतिष) को संक्षिप्त करके मैं म