फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५५ शरीरप्रयासैः कृतं कर्म यत्तत् व्रजेन्निष्फलत्वं लघुत्वं जनेषु । जनद्रोहकारी स्वकुक्षिभरिः स्यात् अजस्रं प्रवासी च दुर्योगजातः ॥६७॥ ऋणग्रस्त उग्रो दरिद्राग्रगण्यो भवेत्कर्णरोगी च सौभ्रात्रहीनः । अकार्यप्रवृत्तो रसाभासवादी परप्रेष्यकः स्याद्दरिद्राख्ययोगे ॥६८॥ किञ्चिद्व्ययो भूरिधनाभिवृद्धि प्रयात्ययं सर्वजनानुकूल्यम् । सुखी स्वतन्त्रो महनीयवृत्ति र्गुणैः प्रतीतो विमलोद्भवः स्यात् ॥६९॥ (१) यदि लग्न या लग्नेश अशुभ ग्रह से युत* या वीक्षित हो और लग्नेश दुःस्थान में हो तो "अवयोग" होता है। जो अवयोग में पैदा होता है उसकी स्थिति बहुत चंचल होती है। ऐसा व्यक्ति असज्जनों के साथ रहता है; न उसका शरीर अच्छा रहता है (शरीर में कोई न कोई रोग लगा रहे); न उसका चरित्र ही अच्छा होता है । जातक स्वल्पायु और अप्रसिद्ध रहता है; और घोर दरिद्रता, तथा अपमान को प्राप्त होता है। मन्त्रेश्वर महाराज ने बहुत सुन्दर लिखा है। लग्न और लग्नेश के बलवान् होने से सारी कुण्डली सुधर जाती है और लग्न तथा लग्नेश के दुर्बल होने से सारी कुंडली बिगड़ जाती है, ऐसा हमारा विचार है।
- साथ रहने को युत कहते हैं । वीक्षित का अर्थ है - "देखा जाता हो"