फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफलदीपिका १५७ ह । ऐसे व्यक्ति को कहीं आश्रय नही मिलता—कोई न कोई संकट ऐसा उपस्थित हो जाता है कि अपना स्थान छोड़ना पड़ता है । ऐसा व्यक्ति कुस्त्री (खराब औरत) में अभिरत होता है । संक्षेप में चौथे घर से जिन बातों का विचार किया जाता है उन सबके कारण क्लेश उठाना पड़ता है । चौथे घर से स्त्री का विचार नहीं किया जाता । सुख का विचार किया जाता है । कुस्त्री में रत होना सबसे बड़े क्लेश की जड़ है । यद्यपि मन्त्रेश्वर महाराज ने यह नहीं लिखा है, परन्तु हमारा अनुभव है कि शनि यदि चौथे घर में हो और चौथे घर का मालिक भी बिगड़ा हो तो बुढ़ापा बहुत दरिद्रता में बीतता है । साथ वाली कुंडली एक ऐसे सज्जन की है जिन्होंने विलायत की यात्रा की और लन्दन के सुप्रसिद्ध सैवोय होटल में ठहरे । जवानी में बड़े-बड़े बाग वाली आलीशान कोठियों में रहे परन्तु बुढ़ापा घोर दरिद्रता में बिता रहे हैं । (५) यदि पंचमेश या पंचम स्थान अशुभ ग्रह