फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ छठा अध्याय : योग (६) यदि छठा घर अशुभ ग्रहों से युत या वीक्षित हो और छठे घर का मालिक दुःस्थान स्थित हो तो हर्ष योग होता है। ऐसा व्यक्ति भाग्यवान्, दृढ़ शरीर वाला, सुखी, भोगी, शत्रुओं को पराजित करने वाला और पाप भीरु होता है । (जो व्यक्ति पाप से डरे और पुण्य कर्म करे उसे पाप भीरु कहते हैं। यह गुण है) ऐसा व्यक्ति विख्यात और प्रधान व्यक्तियों का प्यारा होता है। और उसे धन, पुत्र, मित्र का पूर्ण सुख मिलता है। हर्ष योग वाले व्यक्ति यशस्वी होते हैं और उनके चेहरे पर शोभा रहती है ।* (७) यदि सप्तमेश या सातवाँ घर अशुभ ग्रहों से युत वीक्षित हो और सातवें घर का मालिक दुःस्थान में पड़ा हो तो दुष्कृति योग होता है। ऐसे व्यक्ति को सप्तम स्थान सम्बन्धी सभी कष्ट प्राप्त होते हैं- अपनी पत्नी का वियोग (चाहे वह मर जाय चाहे उससे अलग रहना पड़े या रोगिणी हो), दूसरे की स्त्री से रति हो, इसकी इच्छा रहे (हृदय जलता रहे सुख की प्राप्ति न हो) कष्टमय मंज़िल (सफ़र) करनी पड़े। जातक के बन्धु लोग उसे धिक्कारें, इस कारण उसे शोक प्राप्त हो। राजा या सरकार से पीड़ा मिले। सप्तम स्थान से जननेन्द्रिय का विचार किया जाता है। सप्तम भाव और सप्तमेश दोनो बिगड़े हों तो प्रमेह (सुजाक, आतशक आदि) इन्द्रिय सम्बन्धी एक या अधिक रोग हों । (८) यदि अष्टम भाव का स्वामी छठें, आठवें बारहवें घर में बैठा हो सरल योग होता है। जो सरल योग में पैदा होता है वह दीर्घायु, दृढ़ मति (मुस्तकिल मिज़ाज) निर्भय, लक्ष्मीवान्, विद्या, पुत्र और धन से युत, अपने उद्योग में सफलता प्राप्त करने वाला निर्मल और शत्रुओं
- षष्ठेश दुःस्थान में हो तो भी अच्छा फल बताया और सुस्थान में हो तो भी अच्छा फल । देखिये पृष्ठ १४९-१५० । छठे स्थान में शुभ ग्रह हो तो भी अच्छा फल और पाप ग्रह हो तो भी अच्छा फल ।