भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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फलदीपिका १५९ को जीतने वाला, विख्यात पुरुष होता है। मन्त्रेश्वर महाराज के विचार से अष्टम दुःस्थान होने के कारण इसका मालिक भी यदि दुःस्थान में जावे तो उसी प्रकार उत्तम गिना जाता है जैसे यदि अपना दुश्मन गड्ढे में में पड़ा हुआ हो तो इसे उत्तम कहेंगे। वी० सुब्रह्मण्य शास्त्री ने टीका करते हुए लिखा है, कि अष्टम भाव पाप ग्रह युतवीक्षित हो तो भी 'सरल' योग होता है। परन्तु हमारे विचार से अष्टम ग्रह को यदि पाप ग्रह देखें या अष्टम में पाप ग्रह बैठें तो जिस भाव के वे स्वामी हैं उनको तो बिगाड़ेंगे ही साथ में अष्टम भाव को भी बिगाड़ेंगे— केवल मात्र शनि के सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि अष्टम में शनि आयु को बढ़ाता है। अष्टम में मंगल तो बहुत ही खराब है; गुदा रोग करता है और मनुष्य को प्रायः कर्जदार रखता है। अष्टम में केतु भी गुदा सम्बन्धी रोग देता है जैसे कांच निकलना। इन सब उदाहरणों द्वारा हमारा अभिप्राय यह है कि अष्टमेश दुःस्थान में बैठे अर्थात् छठे या बारह में बैठे तो सरल योग होगा किन्तु अष्टम भाव में पाप ग्रह का बैठना उत्तम नहीं। (९) यदि नवें भवन का स्वामी लग्न से ६, ८, या १२वें भाव में हो और नवमेश तथा नवम गृह पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि हो या वहां अशुभ ग्रह बैठे हों (या नवमेश पाप ग्रह युत वीक्षित हो) तो “निर्भाग्य” योग होता है। जो व्यक्ति निर्भाग्य योग में पैदा होता है वह बहुत दुःख उठाने वाला, पुराने कपड़े पहनने वाला दुर्गति को प्राप्त होता है। नवम भाव धर्म भाव है यह बिगड़ने से मनुष्य साधुओं की और गुरुओं की निन्दा करता है। ऐसे व्यक्ति को जो कुछ पैत्रिक सम्पति प्राप्त होती है (घर, खेत, ज़मीन, जायदाद) वह सब नष्ट हो जाती है। (१०) यदि दशम में क्रूर ग्रह बैठे हों और दशमेश अशुभ ग्रहों से वीक्षित या युत हो और वह (दशम ग्रह का मालिक) ६, ८, या बारहवें स्थान में पड़ा हो तो “दुर्योग” होता है। जिस व्यक्ति की कुण्डली में यह