फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० छठा अध्याय : योग योग हो उस मनुष्य के द्वारा पूर्ण परिश्रम से किए हुये कार्यों में भी सफलता प्राप्त नहीं होती। उसके प्रयास निष्फल होते हैं। ऐसा मनुष्य प्रायः प्रवासी (घर से बाहर परदेश में) रहता है। दुर्योग में उत्पन्न मनुष्य का आदर नहीं होता। वह और लोगों से द्रोह करता रहता है और अपने पेट पालने की ही फिक्र में रहता है। (११) यदि ११वें भाव का स्वामी दुःस्थान में हो तो दरिद्रयोग होता है। हमने ऊपर अनेक स्थानों पर यह लिखा है कि भावपति दुःस्थान में हो और भाव अशुभ ग्रह से युत वीक्षित हो तो योग होगा। वास्तव में यह एक टीकाकार का मत है। मन्त्रेश्वर महाराज ने ५७वें श्लोक की प्रारम्भिक दो पंक्तियों में जो शब्द उपयोग किये हैं उनका यह अर्थ करना विशेष उपयुक्त होगा कि भावेश दुःस्थान में हो और भावेश अशुभ ग्रहों से युत वीक्षित हो और भाव भी अशुभ ग्रहों से युत वीक्षित हो तो विविध योग होते हैं। किन्तु इसके अपवाद हैं यदि भाव में सर्वत्र अशुभ ग्रह होने से खराब योग बने तो एकादश भाव में पाप ग्रह के बैठने से दरिद्रयोग बनना चाहिये ? किन्तु ज्योतिषियों का आप्त वाक्य है कि "लाभे सर्वे प्रशस्ताः" सारावली में भी लिखा है कि लग्नस्थाः सुखसंस्थाः दशमस्थापि कारकाः सर्वे । एकादशमपि केचित् वाञ्छन्ति न तन्मतं मुनीन्द्राणाम् ॥ अतः हम यही अर्थ करेंगे कि यदि एकादशेश त्रिक में हो या अशुभ ग्रहों से युत वीक्षित हो तो दरिद्रयोग होता है। जिसकी जन्मकुण्डली में यह योग हो वह कर्जदार, अत्यन्त दरिद्री कान की बीमारी से तकलीफ़ पाने वाला, अच्छे भाइयों से हीन, दुष्कार्य करने वाला, अप्रशस्त वचन बोलने वाला, दूसरे का नौकर और दुःख उठाने वाला होता है। (१२) यदि १२वें घर का मालिक दुःस्थान में हो और अशुभ ग्रहों से युत वीक्षित हो तो विमल योग होता है। ऐसा व्यक्ति व्यय