भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

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१६४ फलदीपिका के समान वैभवशाली हो जाते हैं । या कदाचित् राजा भी हो जाँय । ॥ २ ॥

यद्येकोऽपि विराजितांशुनिकरः सुस्थानगो वक्रगो नीचस्थोऽपि करोति भूपसदृशं द्वौ वा त्रयो वा ग्रहाः । एवं चेज्जनयन्ति भूपतिममी शस्तांशराशिस्थिता स्तद्वच्चेद्बहवो नृपं समकुटच्छत्रोल्लसच्चामरम् ॥३॥

एक भी ग्रह यदि सुस्थान में हो (६,८ या १२वें भाग में न हो) और वक्री हो (चाहे, नीच भी हो), किन्तु यदि अस्त न हो और उज्ज्वल प्रभा से *युक्त हो तो वह राजा के सदृश वैभवशाली बना देता है। यदि ऐसे दो या तीन ग्रह हों तो जातक राजा हो जाता है। यदि ऐसे बहुत से ग्रह हों और वे उत्तम राशि और उत्तम नवांश में स्थित हों तो मुकुट, छत्र और चाँवर से शोभायमान अत्यन्त वैभव- शाली राजा होता है। हमारे विचार से राजवंश प्रसूत नरों में ही यह योग विशेष लागू करना चाहिये । ॥३॥

द्वौ वा त्र्याद्या दिग्बलयुक्ता यदि जातः क्ष्माभृद्वंशे भूमिपतिः स्याज्जयशीलः । हित्वा मन्दं पञ्चखगा दिग्बलयुक्ता- श्चत्वारो वा भूपतिरन्यन्वयजोऽपि ॥४॥

*सूर्य के सान्निध्य के कारण ग्रहों की किरणें सूर्य प्रकाश में लय होने से नहीं दिखाई देती उस दशा में ग्रह को अस्त कहते हैं किन्तु जब ग्रह सूर्य से दूर होता है तो वह खूब उज्ज्वल भा पूर्ण दिखाई देता है। ऐसा ग्रह बलवान् होता है ।