फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय : राजयोग १६५ यदि जातक राजवंश में उत्पन्न हुआ हो और उसकी कुण्डली में दो या अधिक ग्रह दिग्बली हों जो वह राजा होता है और सर्वत्र विजय प्राप्त करता है । सूर्य और मंगल दशम भाव मध्य में पूर्ण दिग्बली होते हैं । बुध और बृहस्पति प्रथम भाव मध्ध में पूर्ण दिग्बली होते हैं, चन्द्रमा तथा शुक्र चतुर्थ भाव मध्य में पूर्ण दिग्बली होते हैं तथा शनि सप्तम भाव मध्य में पूर्ण दिग्बली होता है । यदि शनि को छोड़कर बाकी ६ ग्रहों में से कोई से पांच दिग्बली हों या ४ भी दिग्बली हों तो चाहे किसी भी वंश में पैदा हो (यह ज़रुरी नहीं कि राजा के ही वंश में पैदा हो) तो राजा होता है ॥ ४ ॥ गणोत्तमे लग्ननवांशकोद्गमे निशाकरश्चापि गणोत्तमेऽपि वा । चतुर्ग्रहैश्चन्द्रविवर्जितैस्तदा निरीक्षितः स्यादधमोद्भवो नृपः ॥५॥ यदि लग्न में वर्गोत्तम* नवांश हो और चन्द्रका भी वर्गोत्तम नवांश हो और लग्न को चन्द्रमा के अतिरिक्त अन्य चार ग्रह देखते हों तो ऐसा जातक चाहे अधम वंश में भी पैदा हुआ हो राजा हो जाता है ।॥५॥ श्रीरवीन्द्रनाथ ठाकुर की कुंडली नीचे दी जाती है। इनका जन्म लग्नमीन है और नवांश लग्न भी मीन ही है इस कारण वर्गोत्तमलग्न हुआ । रेवती नक्षत्र में जन्म होने के कारण मीन राशि का चन्द्रमा था। और रेवती नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म होने के कारण चन्द्रमा मीन नवांश में था । अतः चन्द्रमा भी वर्गोत्तम हुआ । लग्नेश बृहस्पति *जो राशि हो वही नवांश भी हो तो वर्गोत्तम कहलाता है । जैसे मेष राशि मेष नवांश वर्गोत्तम । वृषभ राशि, वृषभ नवांश वर्गोत्तम, मिथुन राशि, मिथुन नवांश वर्गोत्तम इत्यादि ।