फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 169, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें१६८ फलदीपिका या नीच राशि नहीं होनी चाहिये) तो ऐसा व्यक्ति राजा होता है । ॥८॥ भौमश्चेदजहरिचापलग्नसंस्थः पृथ्वीशं कलयति मित्रखेटदृष्टः । कर्मेशो नवमगतश्च भाग्यनाथो मध्यस्थो भवति नृपो जनैः प्रशस्तः ॥९॥ (क) यदि मंगल, मेष, सिंह या धनु राशि में स्थित होकर लग्न में हो और उसको मित्र ग्रह देखता हो तो मनुष्य राजा होता है । (ख) यदि दशम स्थान का स्वामी नवम भाव में स्थित हो और नवम भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति राजा होता है और सब उसकी प्रशंसा करते हैं। तात्पर्य यह है कि यह योग प्रबल- राजयोग कारक है । ॥९॥ चापार्द्धे भगवान् सहस्रकिरणस्तत्रैव ताराधिपो लग्ने भानुसुतेऽतिवीर्यसहितः स्वोच्चे च भूनन्दनः । यद्येवं भवति क्षितेरधिपतिः संश्रुत्य दूरं भयात् त्रस्ता एव नमन्ति तस्य रिपवो दग्धाः प्रतापाग्निना ॥१०॥ यदि धनु राशि के आधे में (पन्द्रह अंश तक) सूर्य हो और वहीं चन्द्रमा हो और लग्न में शनि* हो तथा अति बलवान् मंगल उच्च
- मन्मेश्वर महाराज ने यहां नहीं लिखा है किन्तु अन्य आचार्यों के मत से तुला धनु मकर कुम्भ और मीन इन पांच राशियों में लग्नस्थ शनिश्चर को प्रशस्त माना गया है ।