भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 170

सातवाँ अध्याय : राजयोग १६९ राशि में हो तो जातक बड़ा पराक्रमी राजा होता है उसके भय से उसके शत्रु उसे दूर से ही नमस्कार करते हैं ॥१०॥ सुधामृणालोपमविम्बशोभितः शशी नवांशे नलिनीप्रियस्य यदि क्षितीशो बहुहस्तिपूर्णः शुभाश्च केन्द्रेषु न पापयुक्ताः ॥११॥ यदि अमृत या मृणाल के समान सफेद पूर्ण विम्ब वाला (पूर्णिमा के आस पास का) चन्द्र सिंह नवांश में हो और शुभ ग्रह (पाप ग्रहों से संयुत नहीं होने चाहिये) केन्द्र में हों तो ऐसा जातक राजा होता है और उसके बहुत से हाथी होते हैं ॥११॥ नीचारिवर्गरहितैर्विहगैस्त्रिभिस्तु स्वांशोपगैर्बलयुतैः शुभदृष्टिजुष्टैः । गोक्षीरशङ्खधवलोमृगलाञ्छनश्च स्याद्यस्य जन्मनि स भूमिपतिर्जितारिः ॥१२॥ यदि चन्द्रमा गाय के दूध या शंख के समान उज्ज्वल कान्ति वाला हो (पक्ष बली हो) और तीन और ग्रह (चन्द्रमा मिलाकर चार) बलवान् होकर अपने-अपने अंशो में हो। नीच राशि या नीच वर्ग में न हों, शत्रु राशि या शत्रु वर्ग में न हों और उनको शुभ ग्रह देखते हों तो ऐसा व्यक्ति भूमिपति होता है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। ॥१२॥* कुमुदगहनबन्धुं श्रेष्ठमंशं प्रपन्नं यदि बलसमुपेतः पश्यति व्योमचारी । उदयभवनसंस्थः पापसंज्ञो न चैवं भवति मनुजनाथः सार्वभौमः सुदेहः ॥१३॥

  • कुछ लोगों के मत से चन्द्रमा लग्न में होना चाहिये ।