भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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सातवाँ अध्याय : राजयोग १७१ शुक्रेज्यौ सवितुः शिशुस्तिमियुगे स्वोच्चे च पूर्णः शशी दृष्टस्तीव्रविलोचनेन दिनकृन्मेषोदयेऽसौ नृपः । सेनायाश्चलनेन रेणुपटलैर्यस्य प्रविष्टे रवा- वस्तभ्रान्तिसमाकुला कमलिनी संकोचमागच्छति ॥१५॥ शुक्र, बृहस्पति और शनि मीन राशि में हों, चन्द्रमा पूर्ण हो (पूर्णिमा का) और अपनी उच्च राशि में हो, सूर्य को मंगल देखता हो और मेष लग्न हो तो ऐसा व्यक्ति बहुत बड़ा राजा होता है। जिसकी सेना के चलने के कारण इतनी धूल उड़ती है कि दिन में भी संध्या की भ्रान्ति होने से कमलिनी संकोच को प्राप्त हो जाती है। ॥१५॥ नीचारिस्थैर्भवभवनगैः षष्ठदुश्चिक्यगैर्वा । सौम्यैः स्वोच्चं परममुपगतैर्निर्मलैः केन्द्रगैर्वा । आज्ञां याते शिशिरकिरणे कर्कटस्थे निशाया- मेकच्छत्रं त्रिभुवनमिदं यस्य स क्षत्रियेश