भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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१७२ फलदीपिका यदि पूर्णिमा का चन्द्र वर्गोत्तमांश में हो तो केवल एक इसी योग से मनुष्य महा प्रतापशाली राजा होता है, जिसकी सेना के घोड़ों के खुरों से उड़ी हुई धूलि सूर्य को ऐसा म्लान कर देती है कि सूर्य प्रातः कालीन चन्द्र सा नज़र आता है। केन्द्रगौ यदि च जीवशशाङ्कौ यस्य जन्मनि च भार्गवदृष्टौ । भूपतिर्भवति सोऽतुलकीर्ति र्नीचगो यदि न कश्चिदिह स्यात् ॥१८॥ यदि जन्म के समय बृहस्पति और चन्द्रमा केन्द्र में हों और उनको शुक्र देखता हो और कोई ग्रह नीच राशि में न हो तो मनुष्य अतुलकीर्ति वाला राजा होता है । ॥१८॥ जलचरराशिनवांशक इन्दुस्तनुभवने शुभदस्वकवर्गे । अशुभकरः खलु कण्टकहीनो भवति नृपो बहुवारणनाथः॥१९॥ यदि चन्द्रमा जलचर राशि और नवांश में स्थित होकर लग्न में अपने वर्ग में या शुभ ग्रह के वर्ग में हो और कोई पाप ग्रह केन्द्र में न हो तो मनुष्य राजा होता है और बहुत हाथी उसके पास होते हैं । ॥१९॥ शुक्लो जीवनिरीक्षितो वितनुते भूपोद्भवं भूपति देवेड्यो मृगभं विहाय तनुगो मत्तेभयुक्तं नृपम् । केन्द्रे जन्मपतिर्बलाधिकयुतः कुर्याद्धरित्रीपतिं दृष्टे वाक्पतिना बुधे दधति पृथ्वीशाश्च तच्छासनम् ॥२०॥