फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय : राजयोग १७३ इस श्लोक में चार योग बताए हैं । चारों पृथक्-पृथक् हैं(क) यदि जातक राजवंश में उत्पन्न हुआ हो और शुक्र को बृहस्पति देखता हो तो मनुष्य राजा होता है। (ख) यदि मकर राशि के अलावा अन्य किसी राशि में स्थित होकर बृहस्पति लग्नं में हो तो यह उत्तम राजयोग है। (ग) यदि लग्नेश* बलवान् होकर केन्द्र में हो तो यह अकेला प्रबल योग है (घ) जिसकी जन्म कुण्डली में बुध को बृहस्पति देखता है उसकी सलाह को महाराजा भी मानते हैं । ॥२०॥ एकोप्युच्चक्षेत्रगो मित्रदृष्टः कुर्याद्भूपं मित्रयोगाद्धनाढ्यम् । स्वांशे सूर्ये स्वक्षं गश्चन्द्रमा- श्चेद्देशाधीशं साश्वनागं विधत्ते ॥२१॥ (क) यदि एक भी ग्रह उच्च राशि में हो और उसको मित्र ग्रह देखते हों तो ऐसा व्यक्ति राजा होता है। यदि ऐसा उच्च ग्रह मित्र ग्रह से युक्त हो तो मनुष्य धनवान होता है। (ख) यदि सूर्य अपने नवांश में हो और चन्द्रमा कर्क राशि में हो तो भी उत्तम राजयोग है। यद्यपि मूल श्लोक में सूर्य का अपने अंश में होना और चन्द्रमा का अपनी राशि में होना ये दो ही बात कही गई हैं किन्तु सूर्य की राशि भी बलवान् होनी चाहिये और चन्द्रमा का नवांश भी बलवान् होना चाहिये । ऐसा हम अपने विचार से समझते हैं। सूर्य और चन्द्रमा इन दो ग्रहों के बलवान् होने से सारी कुण्डली सुधर जाती है ॥ २१ ॥ *मूल श्लोक में शब्द आया है जन्मपति, इसका बहुत से अर्थ करते हैं जन्म लग्नेश और बहुत से अर्थ करते हैं जन्म राशि का स्वामी ।