भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 175

१७४ फलदीपिका मीने पूर्णज्योतिषि मित्रग्रहदृष्टे चन्द्रे लोकानन्दकरः स्यान्नृपमुख्यः । पूर्णज्योतिः स्वोच्चगतश्चेत्तुहिनांशु- स्त्यागाधिक्यं सज्जनशस्तं जगदीशम् ॥ (क) यदि चन्द्रमा पूर्ण प्रकाशमान होकर मीन राशि में हो और इसको मित्र ग्रह देखता हो तो उत्तम राज योग है । (ख) यदि चन्द्रमा पूर्ण हो और अपनी उच्चराशि में हो तो ऐसा व्यक्ति बहुत उदार होता है और उसकी सज्जन लोग बहुत प्रशंसा करते हैं; वह एक उत्तम राज योग है । ॥२२॥ चन्द्रेऽधिमित्रांशगते सुदृष्टे शुक्रेण लक्ष्मीसहितो नृपः स्यात् तथा स्थिते वासवमन्त्रिदृष्टे पूर्णां धरित्रीं परिपालयेत्सः ॥२३॥ (क) यदि चन्द्रमा अपने अधिमित्र के अंश में हो और उस पर शुक्र की दृष्टि हो तो लक्ष्मी प्राप्ति के साथ-साथ उत्तम राज योग होता है । (ख) ऊपर (क) में जो योग बताया गया है उसके साथ-साथ यदि चन्द्रमा पर बृहस्पति की भी दृष्टि हो तो राजा हो।* ॥२३॥ *वराहमिहिर के मत से यदि दिन में जन्म हो और अपने या अधिमित्र अंश में स्थित चन्द्रमा पर बृहस्पति की दृष्टि हो तो राजयोग होता है और यदि रात्रि में जन्म हो और अपने या अधिमित्र अंश में स्थित चन्द्रमा पर शुक्र की दृष्टि हो तो विशेष वैभव होता है।