भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

सातवाँ अध्याय : राजयोग १७५ पापास्त्रिशत्रुभवगा यदि जन्मनाथा- ल्लग्नाद्धने कुजबुधौ हिबुकेऽर्कशुक्रौ । कर्मायलग्नसहिताः कुजमन्दजीवा- स्तज्ज्ञा वदन्ति चतुरस्त्विह राजयोगान् ॥२४॥ (क) इस श्लोक में चार राज योग बताये गये हैं। यदि जन्म नाथ से ३, ६ और ११वें स्थान में पाप ग्रह हों। (ख) मंगल और बुध लग्न से दूसरे स्थान में हों (ग) सूर्य और शुक्र लग्न से चौथे हों । (घ) मंगल, बृहस्पति और शनि क्रमशः दशम में, लग्न में और एकादश में हों तो यह उत्तम राजयोग होते हैं । मूल श्लोक के प्रथम चरण में जन्मनाथ शब्द आया है अर्थात् जन्म नाथ से । बहुत से लोग इसका अर्थ लग्नेश करते हैं और बहुत से लोगों के मतानुसार जन्मनाथ का अर्थ होता है—जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में हो उसका स्वामी । हमारे विचार से द्वितीय अर्थ विशेष उपयुक्त हैं । इस श्लोक का तृतीय चरण है “कर्मायलग्न सहिताः कुजमन्दजीवाः” इसका अर्थ हुआ दशम, एकादश और लग्न में मंगल, शनि, बृहस्पति हों। यद्यपि मूल श्लोक में क्रमशः यह शब्द नहीं है। परन्तु हमारे विचार से मंगल दशम में दिग्बली होता है। बृहस्पति लग्न में दिग्बली होता है और शनि लाभ स्थान में प्रशस्त माना जाता है । इस कारण १०, ११ और १ में क्रमशः मंगल, शनि और बृहस्पति हों यह अर्थ विशेष उत्तम होगा । ॥२४॥ लाभेशधर्मेशधनेश्वराणामेकोऽपि चन्द्रग्रहकेन्द्रवर्ती । स्वपुत्रलाभाधिपतिर्गुरुश्चेदखण्डसाम्राज्यपतित्वमेति ॥२५॥