भारतकोश
संग्रह पर लौटें

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

१७२ फलदीपिका यदि पूर्णिमा का चन्द्र वर्गोत्तमांश में हो तो केवल एक इसी योग से मनुष्य महा प्रतापशाली राजा होता है, जिसकी सेना के घोड़ों के खुरों से उड़ी हुई धूलि सूर्य को ऐसा म्लान कर देती है कि सूर्य प्रातः कालीन चन्द्र सा नज़र आता है। केन्द्रगौ यदि च जीवशशाङ्कौ यस्य जन्मनि च भार्गवदृष्टौ । भूपतिर्भवति सोऽतुलकीर्ति र्नीचगो यदि न कश्चिदिह स्यात् ॥१८॥ यदि जन्म के समय बृहस्पति और चन्द्रमा केन्द्र में हों और उनको शुक्र देखता हो और कोई ग्रह नीच राशि में न हो तो मनुष्य अतुलकीर्ति वाला राजा होता है । ॥१८॥ जलचरराशिनवांशक इन्दुस्तनुभवने शुभदस्वकवर्गे । अशुभकरः खलु कण्टकहीनो भवति नृपो बहुवारणनाथः॥१९॥ यदि चन्द्रमा जलचर राशि और नवांश में स्थित होकर लग्न में अपने वर्ग में या शुभ ग्रह के वर्ग में हो और कोई पाप ग्रह केन्द्र में न हो तो मनुष्य राजा होता है और बहुत हाथी उसके पास होते हैं । ॥१९॥ शुक्लो जीवनिरीक्षितो वितनुते भूपोद्भवं भूपति देवेड्यो मृगभं विहाय तनुगो मत्तेभयुक्तं नृपम् । केन्द्रे जन्मपतिर्बलाधिकयुतः कुर्याद्धरित्रीपतिं दृष्टे वाक्पतिना बुधे दधति पृथ्वीशाश्च तच्छासनम् ॥२०॥

सातवाँ अध्याय : राजयोग १७३ इस श्लोक में चार योग बताए हैं । चारों पृथक्-पृथक् हैं(क) यदि जातक राजवंश में उत्पन्न हुआ हो और शुक्र को बृहस्पति देखता हो तो मनुष्य राजा होता है। (ख) यदि मकर राशि के अलावा अन्य किसी राशि में स्थित होकर बृहस्पति लग्नं में हो तो यह उत्तम राजयोग है। (ग) यदि लग्नेश* बलवान् होकर केन्द्र में हो तो यह अकेला प्रबल योग है (घ) जिसकी जन्म कुण्डली में बुध को बृहस्पति देखता है उसकी सलाह को महाराजा भी मानते हैं । ॥२०॥ एकोप्युच्चक्षेत्रगो मित्रदृष्टः कुर्याद्भूपं मित्रयोगाद्धनाढ्यम् । स्वांशे सूर्ये स्वक्षं गश्चन्द्रमा- श्चेद्देशाधीशं साश्वनागं विधत्ते ॥२१॥ (क) यदि एक भी ग्रह उच्च राशि में हो और उसको मित्र ग्रह देखते हों तो ऐसा व्यक्ति राजा होता है। यदि ऐसा उच्च ग्रह मित्र ग्रह से युक्त हो तो मनुष्य धनवान होता है। (ख) यदि सूर्य अपने नवांश में हो और चन्द्रमा कर्क राशि में हो तो भी उत्तम राजयोग है। यद्यपि मूल श्लोक में सूर्य का अपने अंश में होना और चन्द्रमा का अपनी राशि में होना ये दो ही बात कही गई हैं किन्तु सूर्य की राशि भी बलवान् होनी चाहिये और चन्द्रमा का नवांश भी बलवान् होना चाहिये । ऐसा हम अपने विचार से समझते हैं। सूर्य और चन्द्रमा इन दो ग्रहों के बलवान् होने से सारी कुण्डली सुधर जाती है ॥ २१ ॥ *मूल श्लोक में शब्द आया है जन्मपति, इसका बहुत से अर्थ करते हैं जन्म लग्नेश और बहुत से अर्थ करते हैं जन्म राशि का स्वामी ।

१७४ फलदीपिका मीने पूर्णज्योतिषि मित्रग्रहदृष्टे चन्द्रे लोकानन्दकरः स्यान्नृपमुख्यः । पूर्णज्योतिः स्वोच्चगतश्चेत्तुहिनांशु- स्त्यागाधिक्यं सज्जनशस्तं जगदीशम् ॥ (क) यदि चन्द्रमा पूर्ण प्रकाशमान होकर मीन राशि में हो और इसको मित्र ग्रह देखता हो तो उत्तम राज योग है । (ख) यदि चन्द्रमा पूर्ण हो और अपनी उच्चराशि में हो तो ऐसा व्यक्ति बहुत उदार होता है और उसकी सज्जन लोग बहुत प्रशंसा करते हैं; वह एक उत्तम राज योग है । ॥२२॥ चन्द्रेऽधिमित्रांशगते सुदृष्टे शुक्रेण लक्ष्मीसहितो नृपः स्यात् तथा स्थिते वासवमन्त्रिदृष्टे पूर्णां धरित्रीं परिपालयेत्सः ॥२३॥ (क) यदि चन्द्रमा अपने अधिमित्र के अंश में हो और उस पर शुक्र की दृष्टि हो तो लक्ष्मी प्राप्ति के साथ-साथ उत्तम राज योग होता है । (ख) ऊपर (क) में जो योग बताया गया है उसके साथ-साथ यदि चन्द्रमा पर बृहस्पति की भी दृष्टि हो तो राजा हो।* ॥२३॥ *वराहमिहिर के मत से यदि दिन में जन्म हो और अपने या अधिमित्र अंश में स्थित चन्द्रमा पर बृहस्पति की दृष्टि हो तो राजयोग होता है और यदि रात्रि में जन्म हो और अपने या अधिमित्र अंश में स्थित चन्द्रमा पर शुक्र की दृष्टि हो तो विशेष वैभव होता है।

सातवाँ अध्याय : राजयोग १७५ पापास्त्रिशत्रुभवगा यदि जन्मनाथा- ल्लग्नाद्धने कुजबुधौ हिबुकेऽर्कशुक्रौ । कर्मायलग्नसहिताः कुजमन्दजीवा- स्तज्ज्ञा वदन्ति चतुरस्त्विह राजयोगान् ॥२४॥ (क) इस श्लोक में चार राज योग बताये गये हैं। यदि जन्म नाथ से ३, ६ और ११वें स्थान में पाप ग्रह हों। (ख) मंगल और बुध लग्न से दूसरे स्थान में हों (ग) सूर्य और शुक्र लग्न से चौथे हों । (घ) मंगल, बृहस्पति और शनि क्रमशः दशम में, लग्न में और एकादश में हों तो यह उत्तम राजयोग होते हैं । मूल श्लोक के प्रथम चरण में जन्मनाथ शब्द आया है अर्थात् जन्म नाथ से । बहुत से लोग इसका अर्थ लग्नेश करते हैं और बहुत से लोगों के मतानुसार जन्मनाथ का अर्थ होता है—जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में हो उसका स्वामी । हमारे विचार से द्वितीय अर्थ विशेष उपयुक्त हैं । इस श्लोक का तृतीय चरण है “कर्मायलग्न सहिताः कुजमन्दजीवाः” इसका अर्थ हुआ दशम, एकादश और लग्न में मंगल, शनि, बृहस्पति हों। यद्यपि मूल श्लोक में क्रमशः यह शब्द नहीं है। परन्तु हमारे विचार से मंगल दशम में दिग्बली होता है। बृहस्पति लग्न में दिग्बली होता है और शनि लाभ स्थान में प्रशस्त माना जाता है । इस कारण १०, ११ और १ में क्रमशः मंगल, शनि और बृहस्पति हों यह अर्थ विशेष उत्तम होगा । ॥२४॥ लाभेशधर्मेशधनेश्वराणामेकोऽपि चन्द्रग्रहकेन्द्रवर्ती । स्वपुत्रलाभाधिपतिर्गुरुश्चेदखण्डसाम्राज्यपतित्वमेति ॥२५॥

१७६ फलदीपिका यदि (क) द्वितीय, नवम और एकादश इन तीनों के स्वामियों में से एक भी ग्रह चन्द्रमा से केन्द्र में हो और (ख) द्वितीय, पञ्चम और एकादश इनमें से किसी का मालिक बृहस्पति हो—यह दोनों बातें घटित होती हों तो उत्तम राजयोग होता है। ॥२५॥ नीचभंग राजयोग नीचस्थितो जन्मनि यो ग्रहः स्यात्तद्राशिनाथोऽपि तदुच्चनाथः । स चन्द्रलग्नाद्यदि केन्द्रवर्ती राजा भवेद्धार्मिकचक्रवर्ती ॥२६॥ जन्म कुण्डली में किसी ग्रह का नीच राशि में स्थित होना ख़राब योग माना गया है। किन्तु कभी-कभी ग्रह नीच राशि में स्थित होकर भी बहुत उत्तम प्रभाव दिखाते हैं अर्थात् उनके नीच होने का जो दोष है वह भंग हो जाता है--और वह फ़ायदेमन्द साबित होते हैं। ऐसा कब होता है ? यह नीचे के पांच श्लोकों में बताया गया है। यदि किसी के जन्म के समय कोई ग्रह नीच राशि में पड़ा हो और (क) इस नीच राशि का स्वामी चन्द्रमा से केन्द्र में हो और (ख) जो ग्रह नीच है और उसका उच्चनाथ भी चन्द्रमा से केन्द्र में हो तो नीच भंग हो जाता है बल्कि उत्तम राज योग बनाता है। यह समस्त एक योग है। उच्चनाथ शब्द का क्या अर्थ ? इसके अर्थ में मतभेद है; मान लीजिये शनि मेष राशि का नीच का है। इसका उच्चनाथ कौन हुआ ? एक मत तो यह कि शनि तुला राशि का उच्च का होता है और तुला का स्वामी शुक्र होता है इस कारण उच्चनाथ शुक्र हुआ। दूसरा मत यह है कि शनि मेष राशि में है और मेष में सूर्य उच्च का होता है इस कारण उच्चनाथ सूर्य हुआ। हमारे विचार से पहला अर्थ विशेष उपयुक्त है। सूर्य का उच्चनाथ मंगल, चन्द्रमा का उच्चनाथ शुक्र, बुध का उच्चनाथ बुध, बृहस्पति

सातवाँ अध्याय : राजयोग १७७ का उच्चनाथ चन्द्रमा, शुक्र का उच्चनाथ बृहस्पति और शनि का उच्चनाथ शुक्र जैसा ऊपर समझाया गया है। ऊपर नीचभंग होने के लिये (क) और (ख) दो शर्तें बताई गई हैं। जब दोनों ही पूरी होंगी तब ही नीच भंग होगा। अब नीच भंग का एक अन्य योग बताते हैं। ॥२६॥ एक टीकाकार इस श्लोक का अय करते हैं कि (i) जो ग्रह नीच राशि में हो उसका स्वामी लग्न से केन्द्र में हों या (ii) जो नीच राशि में ग्रह है उसका स्वामी चन्द्रमा से केन्द्र में हो (iii) या जो ग्रह नीच राशि में है उसका उच्चनाथ लग्न से केन्द्र में हो या (iv) जो ग्रह नीच राशि में है उसका उच्चनाथ चन्द्रमा से केन्द्र में हो—इन चारों परिस्थितियों में नीच भंग हो जावेगा। परन्तु हम इस अर्थ से सहमत नहीं हैं क्योंकि मूल संस्कृत श्लोक में 'अपि' शब्द आया है जिस का अर्थ है कि जो ग्रह नीच राशि में है उसका स्वामी और उसका उच्चनाथ भी-अर्थात् दोनों, केवल एक नहीं। इसी प्रकार मूल श्लोक में लिखा है 'चन्द्रलग्नात्' जिसका श्री सुब्रह्मण्य शास्त्री ने अर्थ किया है 'चन्द्रमा से या लग्न से' परन्तु यदि दोनों से अभिप्राय होता तो मूल संस्कृत में 'चन्द्रलग्नात्' यह पञ्चमी का एक वचन नहीं आता। चन्द्र लग्नात् का अर्थ है चन्द्रलग्न से अर्थात् चन्द्रमा जिस राशि में है उससे। यदि इस श्लोक में दी गई चार शर्तों को अलग-अलग चार योग मान लेंगे तब तो प्रायः सभी नीच ग्रहों का भंग हो जावेगा क्योंकि जो ग्रह नीच राशि का है उसका स्वामी यदि लग्न से केन्द्र में हो (चार घर इसके अन्तर्गत आ गये) या चन्द्रमा से केन्द्र में हो (चार घर इस परिभाषा में आ गये) या उच्चनाथ लग्न से केन्द्र में हो (चार घर इसमें आ गये) या चन्द्र से केन्द्र में हो (चार घर इसमें आ गये) इस प्रकार १६ निर्दिष्ट स्थानों में से कहीं न कहीं आ जावेगा ही। परन्तु आगे २९वें श्लोक में यही कहा है।

१७८ फलदीपिका एक टीकाकार यह भी अर्थ करते हैं कि यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो और उस नीच राशि का स्वामी या उस नीच ग्रह का उच्चनाथ उस नीच ग्रह से केन्द्र में हो तो नीच भंग राजयोग होता है। यद्येको नीचगतस्तद्राश्यधिपस्तदुच्चपः केन्द्रे । यस्य स तु चक्रवर्ती समस्तभूपालवन्द्यांघ्रिः ॥२७॥ यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो तो (क) उस नीच राशि का स्वामी और जो ग्रह नीच का है उसका उच्चनाथ यदि दोनों परस्पर केन्द्र में हों तो नीच भंग राजयोग होता है। यहां भी उच्चनाथ के दो अर्थ हो सकते हैं परन्तु हम यही अर्थ लेंगे कि नीच ग्रह जिस राशि में उच्च होता है उस राशि का स्वामी उच्चप या उच्चनाथ कहलावेगा ॥२७॥ यस्मिन्त्राशौ वर्तते खेचरस्तद्राशीशेन प्रेक्षितश्चेत्स खेटः । क्षोणीपालं कीर्तिमन्तं विदध्यात् सुस्थानश्चेत्किंपुनः पार्थिवेन्द्रः ॥ एक अन्य नीच भग राजयोग बताते हैं। जिस राशि में नीच ग्रह हो उस राशि का स्वामी यदि नीच ग्रह को पूर्ण दृष्टि से देखता हो तो नीच भंग राज योग होता है। यदि यह नीच ग्रह ६-८-१२ दुःस्थान में हो तो इतना अच्छा राजयोग नहीं होगा किन्तु यदि सुस्थान में हो तो बहुत उत्तम नीचभंग राजयोग बनता है ॥२८॥ *श्लोक २७ का एक अन्य अर्थ भी हो सकता है। वह यह है कि यदि कोई ग्रह नीच हो तो उस नीच राशि के स्वामी का जो उच्चनाथ है वह उच्चनाथ यदि केन्द्र में हो तो नीच भंग राजयोग होता है, उदाहरण के लिये किसी की कुण्डली में सूर्य नीच राशि का है, तुलाराशि नाथ शुक्र है। शुक्र उच्च होता है मीन में। मीन का स्वामी हुआ बृहस्पति, यह बृहस्पति यदि केन्द्र में हो तो नीच भंग राज योग हुआ।

सातवां अध्याय : राजयोग १७९ नीचे तिष्ठति यस्तदाश्रितगृहाधीशो विलग्नाद्यदा चन्द्राद्वा यदि नीचगस्य विहगस्योच्चर्क्षनाथोऽथवा । केन्द्रे तिष्ठति चेत्प्रपूर्णविभवः स्याच्चक्रवर्ती नृपो धर्मिष्ठोऽन्यमहीशवन्दितपदस्तेजोयशोभाग्यवान् ॥२९॥ यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो तो (क) इस नीच राशि का स्वामी अथवा (ख) नीच ग्रह का उच्चनाथ इन दोनों में से एक भी जन्म लग्न या चन्द्र लग्न से केन्द्र में हो तो नीचभंग राजयोग होता है । ॥ २९ ॥ नीचे यस्तस्य नीचोच्चभेशौ द्वावेक एव वा केन्द्रस्थश्चेच्चक्रवर्ती भूपः स्याद्भूपवन्दितः ॥३०॥ यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो और उस नीच राशि का स्वामी और नीच ग्रह जिस राशि में उच्च होता है उसका स्वामी वह— एक या दोनों लग्न से केन्द्र में हों तो नीचभंग राज योग होता है । नोट : —श्लोक २६ से ३० तक नीच भंग राजयोग दिए गये हैं इनमें कइयों में पुनरावृत्ति है ।

आठवाँ अध्याय भावाश्रय फल इस अध्याय में सूर्य आदि ग्रहों के भाव फल बताये गये हैं। लग्नेऽर्केऽल्पकचः क्रियालसतमः क्रोधी प्रचण्डोन्नतो मानी लोचनरूक्षकः कृशतनुः शूरोऽक्षमो निर्घृणः। स्फोटाक्षः शशिभे क्रिये सतिमिरः सिंहे निशान्धः पुमान् दारिद्र्योपहतो विनष्टतनयो जातस्तुलायां भवेत् ॥१॥ विगतविद्याविनयवित्तं स्खलितवाचं धनगतः सबलशौर्यश्रियमुदारं स्वजनशत्रुं सहजगः । जनयतीमं सुहृदि सूर्यो विसुखबन्धुक्षितिसुहृद् भवनमुक्तं नृपतिसेवा जनकसंपद्व्ययकरम् ॥२॥ सुखधनायुस्तनयहीनं सुमतिमात्मन्यटविगं प्रथितमुर्वीपतिमरिस्थः सुगुणसंपद्विजयगम् । नृपविरुद्धं कुतनुमस्तेऽध्वगमदारं ह्यवमतं हतधनायुः सुहृदमर्को विगतदृष्टिं निधनगः ॥३॥ विजनकोऽर्के ससुतबन्धुस्तपसि देवद्विजमनाः ससुतयानस्तुतिमतिश्रोबलयशाः खे क्षितिपतिः । भवगतेऽर्के बहुधनायुर्विगतशोको जनपतिः पितुरमित्रं विकलनेत्रो विधनपुत्रो व्ययगते ॥४॥

आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १८१ यदि जन्म के समय सूर्य लग्न में हो तो जातक बहुत थोड़े केश वाला, कार्य करने में आलसी, क्रोधी, प्रचण्ड, लम्बा, मानी (घमण्डी) शूर, क्रूर, क्षमा न करने वाला होगा । उसके नेत्र रूखे होंगे । यदि जन्म लग्न कर्क हो और उसमें सूर्य हो तो मनुष्य स्फोटाक्ष होता है—यदि मेष में स्थित सूर्य लग्न में हो तो भी उसे नेत्र रोग होता है (तिमिर रोग) यदि सिंह राशि का सूर्य लग्न में हो तो उसे रात्रि में नहीं दीखता । यदि तुला राशि का सूर्य लग्न में हो तो बहुत अनिष्ट फल होते हैं । मनुष्य दरिद्री रहता है और उसके पुत्र नष्ट हो जाते हैं । ॥१॥ यदि सूर्य द्वितीय में हो तो मनुष्य विद्या, विनय, और धन से हीन होता है; उसकी वाणी में भी दोष होता है । हकलाना या इसी प्रकार का दोष हो । यदि सूर्य तृतीय में हो तो मनुष्य बलवान् शूरवीर,, धनी और उदार होता है, किन्तु अपने (सम्बन्धी) लोगों से शत्रुता रखता है । यदि चौथे स्थान में सूर्य हो तो सुख हीन, बन्धु- हीन, मित्रहीन और भूमिहीन हो । मकान हीन भी हो । चतुर्थ से इन सब बातों का विचार किया जाता है और क्रूर ग्रह के बैठने का यह फल है । ऐसा व्यक्ति अपने पिता से पाई हुई जायदाद या सम्पत्ति को व्यय कर देता है । और राजा (सरकार) की सेवा करता है ॥ २ ॥ अगर सूर्य पंचम में हो तो सुख हीन, धन हीन, आयु हीन और सुत हीन हो । यह हमारा बहुत बार का देखा हुआ अनुभव है कि पंचम भाव का सूर्य जेष्ठ पुत्र का नाश करता है । किन्तु जातक बुद्धिमान् होता है और जंगल में घूमने का शौकीन होता है । यदि षष्ठ स्थान में सूर्य हो तो मनुष्य राजा के समान श्रेष्ठ वैभव वाला, प्रसिद्ध, धनी,

  • स्फोट का अर्थ होता हैं कोई व्रण, घाव, फोड़ा या नेत्रों का फूलना कोई फूला आदि । कहने का तात्पर्य यह है कि लग्न में मेष, कर्क, और सिंह का सूर्य नेत्र रोग देता है ।

१८२ फलदीपिका विजयी और गुणवान् होता है । यदि सूर्य सप्तम में हो तो कुतन (ख़राब शरीर वाला—शरीर में कोई विकार हो) ऐसा व्यक्ति राज विरुद्ध कार्य करता है अर्थात् सरकार का विरोध करता है । ऐसा मनुष्य व्यर्थ घूमता है और अपमान को प्राप्त होता है । सप्तम में सूर्य स्त्री सुख को भी नष्ट करता है । यदि अष्टम में सूर्य हो तो धन नष्ट हो, आयु नष्ट हो (अल्पायु हो) उसके मित्र नष्ट हों (मित्र न रहें) और विगत दृष्टि हो अर्थात् नेत्रों की ज्योति मन्द पड़ जावे । हमने सैकड़ों कुण्डलियों में देखा है अष्टम का सूर्य दक्षिण* नेत्र को बहुत बिगाड़ता है ॥ ३ ॥ यदि सूर्य नवम भाव में हो तो पिता से हीन हो अर्थात् कम उम्र में ही पिता का सुख न रहे । दक्षिण भारत में नवम भाव से पिता का विचार किया जाता है । इस कारण सूर्य का नवम भाव स्थित होने का पितृ कष्ट फल लिखा है । नवम में सूर्य सन्तान सुख और बन्धु सुख देता है । ऐसा व्यक्ति ब्राह्मण और देवताओं का आदर करता है । यदि दशम में सूर्य हो तो जातक को सन्तान सुख, सवारियों का सुख हो । ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान्, लक्ष्मीवान्, बलवान् और यशस्वी होता है । लोग उसकी प्रशंसा करते हैं और वह राजा के समान वैभवशाली होता है । यदि ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो मनुष्य धनी और दीर्घायु हो; ऐसे व्यक्ति को शोक नहीं होता अर्थात् वह सुखी रहता है । और बहुत से आदमियों के ऊपर हुकूमत करता है । यदि बारहवें घर में सूर्य हो तो अपने पिता से शत्रुता करे । ऐसा जातक नेत्र रोग से युक्त होता है । हमारे विचार से बाएँ नेत्र में विशेष कमजोरी होनी चाहिए । ऐसा जातक धनहीन , पुत्रहीन भी होता है ॥ ४ ॥ सिते चन्द्रे लग्ने दृढतनुरदभ्रायुरभयो बलिष्ठो लक्ष्मीवान् भवति विपरीतं क्षयगते ।

  • दक्षिण = दाहिना

आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १८३ धनाढ्योऽन्तर्वाणिविषयसुखवान् वाचि विकलः सहोत्थे सभ्रातृप्रमदबलशौर्योऽतिकृपणः ॥५॥ सुखी भोगी त्यागी सुहृदि ससुहृद्वाहनयशाः सुपुत्रो मेधावी मृदुगतिरमात्यः सुतगते । क्षतेऽल्पायुश्चन्द्रेऽमतिरुदररोगी परिभवी स्मरे दृष्टेः सौम्यो वरयुवतिकान्तोऽतिसुभगः ॥६॥ मृतौ रोग्यल्पायुस्तपसि शुभधर्मात्मसुतवान् जयी सिद्धारम्भो नभसि शुभकृत्सत्प्रियकरः । मनस्वी बह्वायुर्धनतनयभृत्यैः सह भवे व्यये द्वेष्यो दुःखी शशिनि परिभूतोऽलसतमः ॥७॥ यदि शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा लग्न में हो तो मनुष्य निर्भय, दृढ़ शरीर वाला, बलिष्ठ, लक्ष्मीवान् और दीर्घायु होता है। किन्तु यदि कृष्ण पक्ष का चन्द्रमा हो तो इसका विपरीत फल समझना चाहिये*। यदि चन्द्रमा धन स्थान में हो तो मनुष्य मृदु वचन बोलने वाला, विषय सुखवान् (सांसारिक विषयों में सुख उठाने वाला) और धनाढ्य होता है। किन्तु उसकी वाणी में कुछ विकलता होती हैं। यदि तृतीय भाव में चन्द्रमा हो तो भाइयों का सुख हो; ऐसा व्यक्ति मदयुक्त, बली और शूर किन्तु अत्यन्त कृपण होता है ॥ ५ ॥

  • शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होता है इस कारण इसका शुभ फल दिया है किन्तु यदि चन्द्रमा क्षय को प्राप्त हो तो इसका दुष्ट फल होता है।

१८४ फलदीपिका यदि चतुर्थ भाव में चन्द्रमा हो तो जातक सुखी, भोगी, त्यागी, अच्छे मित्रों वाला, सवारी के सुख को प्राप्त और यशस्वी होता हैं। यदि पंचम में चन्द्रमा हो तो मृदु गति* वाला, मेधावी (बुद्धिमान्) और अच्छे पुत्र वाला हो। ऐसा व्यक्ति राजा का मन्त्री होता है । यदि छठे में चन्द्रमा हो तो मनुष्य अल्पायु, बुद्धि हीन और उदर रोगी हो और परिभव (अपमान या हार) को प्राप्त हो । यदि सप्तम स्थान में चन्द्रमा हो तो स्वयं सौम्य और सुन्दर हो और श्रेष्ठ पत्नी का प्यारा हो (अर्थात् उसकी पत्नी भी बहुत सुन्दर हो और पति-पत्नी में प्रेम भी हो)। यदि अष्टम में चन्द्रमा हो तो जातक रोगी और अल्पायु होता है चन्द्रमा नवम में हो तो जातक शुभ धर्मा (शुभ धार्मिक आचरण करने वाला) होगा और उसके पुत्र भी होंगे। यदि दशम में चन्द्रमा हो तो ऐसा जातक विजयी होता है; जिस काम में वह हाथ लगाता है उसमें प्रारम्भ में ही सफलता हो जाती है। ऐसा व्यक्ति शुभ कर्म करने वाला और सज्जनों के साथ उपकार करने वाला होता है । यदि चन्द्रमा ग्यारहवें भाव में हो तो मनुष्य मनस्वी, दीर्घायु, धनवान्, पुत्रवान्, होता है । और उसे नौकर का भी सुख प्राप्त होता है । व्यय भावगत चन्द्रमा का निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति आलसी, अपमानित, दुःखी होता है और उससे अन्य द्वेष करते हैं। क्षततनुरतिक्रूरोऽल्पायुस्तनौ घनसाहसी वचसि विमुखो निर्विद्यार्थः कुजे कुजनाश्रितः । सुगुणधनवाञ्छूरोऽधृष्यः सुखी व्यनुजोऽनुजे सुहृदि विसुहृन्मातृक्षोणीसुखालयवाहनः ॥८॥

  • गति से अभिप्राय पैदल चलने का है । ** हमारे विचार से अन्य राजयोग होंगे तभी राज मन्त्री होगा ।

आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १८५ विसुखतनयोऽनर्थप्रायः सुते पिशुनोऽल्पधीः प्रबलमदनः श्रीमान् ख्यातो रिपौ विजयी नृपः । अनुचितकरो रोगार्तोऽस्तेऽध्वगो मृतदारवान् कुतनुरधनोऽल्पायुश्छिद्रे कुजे जननिन्दितः ॥९॥ नृपसुहृदपि द्वेष्योऽतातः शुभ जनघातको नभसि नृपतिः क्रूरो दाता प्रधानजनस्तुतः । धनसुखयुतोऽशोकः शूरो भवे सुशीलः कुजे नयनविकृतः क्रूरोऽदारो व्यये पिशुनोऽधमः ॥१०॥ अब मंगल का द्वादश भाव फल बताते हैं। यदि लग्न में मंगल हो तो अति क्रूर और अति साहसी हो । किन्तु ऐसा व्यक्ति अल्पायु होता है और उसके शरीर में चोट लगती है। यदि द्वितीय भाव में मंगल हो तो या तो चेहरा अच्छा न हो या बोलने में प्रवीण न हो । विद्याहीन, धनहीन हो और कुजन (कुत्सित) आदमियों की नौकरी में रहे । तृतीय में मंगल हो तो गुणवान्, धनवान् सुखी और शूर हो; ऐसे आदमी को दूसरा न दबा सके किन्तु तृतीय में मंगल वाले को छोटे भाइयों का सुख नहीं होता । यदि चतुर्थ में मंगल हो तो मनुष्य मातृ हीन, मित्रहीन, सुख हीन, वाहन हीन, और भूमि हीन हो । कहने का तात्पर्य यह है कि चतुर्थ भाव से जिन-जिन बातों का विचार किया जाता है उन सबके सुख में कमी करे । यदि पंचम में मंगल हो तो सन्तान का सुख न हो; उसके भाग्य में बहुत से अनर्थ (खराबी की बातें) होते रहें । ऐसा व्यक्ति बहुत बुद्धिमान् नहीं होता और चुगल खोर होता है । छठे में मंगल हो तो मनुष्य लक्ष्मीवान्, विख्यात, शत्रुओं को जीतने वाला राजा के समान ऐश्वर्य शाली होता है । छठे में मंगल होने से “प्रबलमदनः” विशेष कामी हो । यदि सप्तम में मंगल हो तो अनुचित कर्म करने वाला, रोग से

१८६ फलदीपिका पीड़ित, मार्ग चलने वाला और मृत दारावान् (जिसकी स्त्री मर जाय) होता है । सप्तम पत्नी का स्थान है । सप्तम में मंगल होने से जातक प्रबल मंगलीक होते है इस कारण उनकी पत्नी मर जावे यह लिखा है। किन्तु यदि पत्नी भी मंगलीक हो तो-दोनो (पति-पत्नी) के मंगलीक होने से यह दोष नहीं होता । अर्थात् इस दोष की निवृत्ति हो जाती है । जिस मनुष्य की कुंडली मंगलीक हो उसे मंगलीक कन्या से ही विवाह करना चाहिये तथा जो कन्या मंगलीक हो उसका विवाह मंगलीक वर से ही करना उचित है । मंगल, शनि, राहू केतु, सूर्य यह पाँच ग्रह क्रूर हैं । लग्न से, द्वितीय, (दूसरा घर कुटुम्ब स्थान कहलाता है । पत्नी 'कुटुम्ब' का प्रधान केन्द्रीय स्तभ है यदि केन्द्रीय स्तभ टूट जावे तो शामियाना गिर पड़ता है । इस प्रकार यदि पत्नी नष्ट हो जावे तो कुटुम्ब कैसे बढ़ेगा) चतुर्थ (चतुर्थ सुख स्थान है घर का विचार भी चौथे घर से करते हैं । गृहिणी-घर वाली ही न रहे तो घर कैसा ? चतुर्थ में मंगल 'घर' का सुख नष्ट करता है) सप्तम (पत्नी का स्थान), अष्टम (लिंग मूल से गुदावधि अष्टम भाव होता है इस भाग का पत्नी से सम्बन्ध स्पष्ट है । व्याख्या की आवश्यकता नहीं । पत्नी की कुंडली में इस स्थान का पति से सम्बन्ध सुस्पष्ट है । विवरण व्यर्थ है), तथा द्वादश (बारहवाँ घर "शयन सुख" कहलाता है शय्या का परम सुख कान्ता है। बारहवें में मंगल शयन की सुख हानि करता है-इस कारण ) इन पांच स्थानों में क्रूर ग्रह मंगल, शनि राहू, केतु, सूर्य जिस भाव में हों उस भाव सम्बन्धी सुख की कमी करने के कारण-इनका विचार जन्म कुंडली, चन्द्र कुंडली (चन्द्रमा जिस राशि में हो उसे लग्न मान) तथा शुक्र से (शुक्र 'काम' का अधिष्ठाता है-सप्तम भाव का कारक है इसलिये वैवाहिक सुख विचार में शुक्र का महत्व है) करना चाहिये ।

आठवां अध्याय : भावाश्रय फल १८७ स्त्रियों की कामवासना का मंगल से विशेष विचार करना चाहिये । स्त्रियों के मासिक धर्म प्रवाह का वर्ण रक्त है। पुरुष की कामवासना का विचार शुक्र से इसी कारण शुक्र वीर्य को भी कहते हैं जिसका सफ़ेद वर्ण है) किया जाता है। मंगल 'मकर' में उच्च का होता है शुक्र मीन में उच्च का होता है। इसी कारण कन्दर्प या कामदेव का नाम संस्कृत में मकरध्वज (मकर जिसकी ध्वजा या झंडे में है) और मीन केतन (मीन जिसके झंडे में है) कहा जाता है। न काम देव नाम का कोई शारीरक जन्तु या व्यक्ति है । न उसका कोई झंडा है । केवल एक सिद्धान्त को व्यक्त करने वाले यह् विशेषण हैं। काम का जल तत्व से विशेष सम्बन्ध है। समुद्र (जल) से लक्ष्मी हुई । लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र से इसी कारण मानी गई है। चन्द्रमा जल तत्व प्रधान होने से लक्ष्मी का भाई माना गया। लक्ष्मी का पुत्र काम- देव भी इसी जल तत्व के कारण माना गया है। वसन्त पंचमी को जब प्रायः शुक्र उच्च का होता है-कामदेव का जन्म दिन माना जाता है, वनस्पति जगत् में पहले कली होता है। इसमें जो पराग होता हैं उसे 'रज' कहते हैं । कन्याओं में काम प्रकट होने का प्रथम लक्षण रजदर्शन है । इसी कारण दोनों (कलियों तथा कन्याओं) के सम्बन्ध में 'रज' शब्द का प्रयोग किया गया है। पुष्प विकसित रूप है। इसीलिये मासिक धर्म में जब स्त्री होती है तो उसे संस्कृत में पुष्पिणी कहते हैं। इन्हें-पुष्प को कामदेव का बाण कहते हैं । उसके पाँच वाण हैं-जो फूलों के हैं। शब्द स्पर्श, रूप, रस गंध इन्हीं पाँच से मनुष्य में कामवासना उत्पन्न होती है, यही उसके पाँच बाण हैं। इस प्रकार ज्योतिष शास्त्र में, जो निर्देश किये गये हैं वे गूढ़ सिद्धान्तों पर आधारित हैं, केवल थोड़ा सा दिग्दर्शन करा दिया गया है। अब आठवे घर के मंगल का फल बताते हैं । अष्टम में भी मंगल का निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति कुतनु (ख़राब शरीर वाला अर्थात् शरीर में कहीं रोग हो), धनहीन और अल्पाय होता है और लोग उसकी निन्दा करते हैं । ॥९॥

१८८ फलदीपिका यदि मंगल नवम में हो तो मनुष्य चाहे राजा का प्यारा भी हो ऐसे व्यक्ति से अन्य लोग द्वेष करते हैं, उसे पिता का सुख प्राप्त नहीं होता और ऐसा व्यक्ति जन घातक (जो जनों का घात करे या पीड़ा पहुँचाए) होता है। यदि दशम में मंगल हो तो आदमी क्रूर, दाता, राजा के समान, पराक्रमी हो और वड़े मुख्य आदमी भी उसकी प्रशंसा करें। ११ वें स्थान में मंगल हो तो मनुष्य धनवान्, सुखवान्, शूर, सुशील और शोक रहित होता है। यदि द्वादश में मंगल हो तो ऐसा आदमी चुगल खोर, क्रूर, अदार (पत्नी रहित) और अधम होता है। ऐसे व्यक्ति के नेत्र में भी विकार होता है। ॥१०॥ अब बुध का द्वादश भाव फल बताते हैं। दीर्घायुर्जन्मनि ज्ञे मधुरचतुरवाक् सर्वशास्त्रार्थबोधः स्याद्बुद्ध्योपार्जितस्वः कविरमलवचा वात्रि मिष्टान्नभोक्ता । शौर्ये शूरः समायुः सुसहजसहितः सश्रमो दैन्ययुक्तः संख्यावान् चाटुवाक्यः सुहृदि सुखसुहृत्क्षेत्रधान्यार्थभोगी ॥११॥ विद्यासौख्यप्रतापः प्रचुरसुतयुतो मान्त्रिकः पञ्चमस्थे जातक्रोधो विवादैर्द्विषि रिपुबलहन्तालसो निष्ठुरोक्तिः । प्राज्ञोऽस्ते चारुवेषः ससकलमहिमा याति भार्या सवित्तां विख्याताख्यश्चिरायुः कुलभृदधिपतिर्ज्ञेऽष्टम दण्डनेता ॥१२॥ विद्यार्थाचारधर्मैः सह तपसि बुधे स्यात्प्रवीणोऽतिवाग्मी सिद्धारम्भः सुविद्याबलमतिसुखसत्कर्मसत्यान्वितः खे । *हमारा ऐसा अनुभव है कि अष्टम या द्वादश में मंगल होने से मनुष्य प्रायः ऋणी रहता है। अष्टम में मंगल बवासीर, भगन्दर, या अन्य गुदा रोग भी करता है।

आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १८९ बह्वायुः सत्यसन्धो विपुलधनसुखी लाभगे भृत्ययुक्तो दीनो विद्याविहीनः परिभवसहितोऽन्त्ये नृशंसोऽलसश्च ॥१३॥ यदि लग्न में बुध हो तो ऐसा व्यक्ति सब शास्त्रों में विद्वान्, मधुर और चतुर वाणी बोलने वाला और दीर्घायु होता है। यदि द्वितीय में बुध हो तो अपनी बुद्धि से धनोपार्जन करता है। कवि (बुद्धिमान् या कविता करने वाला) होता है और उसकी वाणी निर्मल होती है और उसे भोजन में मिष्टान्न प्राप्त होते रहते हैं। यदि तृतीय में बुध हो तो मनुष्य शूरवीर हो किन्तु मध्यायु हो। उसके अच्छे भाई बहिन हों परन्तु ऐसे व्यक्ति को श्रम बहुत करना पड़ता है और दैन्ययुक्त होता है। यदि चतुर्थ में बुध हो तो मनुष्य विद्वान्, चाटु वाक्य कहने वाला (जो वचन दूसरों को प्रसन्न करें उन्हें चाटु वाक्य कहते है) होता है। उसे मित्र, क्षेत्र, धान्य, धन ओदि का भोग भी प्राप्त होता है और सुखी होता है। ॥११॥ पञ्चम में बुध हो तो उसके सुख और प्रताप की वृद्धि विद्या के कारण होती है; उसके बहुत सुत होते हैं और ऐसा व्यक्ति मन्त्र शास्त्र का ज्ञाता होता है। यदि छठे में बुध हो तो मनुष्य आलसी निष्ठुर वचन बोलने वाला, अपने शत्रुओं के बल को हनन (नाश) करने वाला किन्तु विवाद करने में ऐसे मनुष्य को बहुत जल्दी और बहुत अधिक क्रोध होजाता है। यदि सप्तम में बुध हो तो ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान् सुन्दर वेष वाला, महामहिमाशाली (सकल महिमा को प्राप्त) होता है और उसकी पत्नी धनिक होती है अर्थात् धनी कुल में विवाह होता और दहेज मिलता है। यदि अष्टम में बुध हो तो मनुष्य दण्ड नेता *दीनता के भाव को दैन्य कहते हैं। **जिसे राज्य से ऐसा अधिकार प्राप्त हो कि औरों को दण्ड दे सके ।

२. अध्याय ८-१४: द्वादश भाव फल, स्त्री-जातक, नष्ट-जातक एवं आयु-निर्णय

१९० फलदीपिका होता है। ऐसा व्यक्ति बहुत विख्यात, दीर्घायु, अपने कुल का पालन करने वाला श्रेष्ठ व्यक्ति होता है। ॥१२॥ यदि नवम में बुध हो तो मनुष्य विद्वान्, धनवान्, धार्मिक और आचारवान् होता है। ऐसा व्यक्ति बहुत बोलने वाला (इसे सद्गुण के अर्थ में लेना चाहिये अवगुण में नहीं) और प्रवीण होता है। दशम में बुध हो तो विद्वान्, बलवान्, बुद्धिमान्, सुखी, सत्कर्म करने वाला सत्यान्वित (सत्य पर कायम रहने वाला होता है) और सफलता प्राप्त करता है। जिस कार्य को प्रारम्भ करता है उसमें प्रारम्भ में ही सिद्धि (सफलता) प्राप्त होती है। यदि ग्यारहवें में बुध हो तो दीर्घायु सच बात पर कायम रहने वाला (अर्थात् जो वचन दे दिया उसे पूरा करने वाला) विपुल धन वाला, सुखी होता है। ऐसे व्यक्ति को नौकरों का सुख भी प्राप्त होता है। द्वादश में बुध का निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति दीन, आलसी, क्रूर, विद्याहीन होता है तथा अपमान को भी प्राप्त होता है। ॥१३॥ शोभावान् सुकृती चिरायुरभयो लग्ने गुरौ सात्मजो वाग्मी भोजनसारवांश्च सुमुखो वित्ते धनी कोविदः । सावज्ञः कृपणः प्रतीतसहजः शौर्येऽघकृद्दुष्टधी- 1 र्बन्धौ मातृसुहृत्परिच्छदसुतस्त्रीसौख्यधान्यान्वितः ॥१४॥ पुत्रैः क्लेशयुतो महीशसचिवो धीमान् सुतस्थे गुरौ षष्ठे स्यादलसोऽरिहा परिभवी मन्त्राभिचारे पटुः । सत्पत्नीसुतवान्मदेऽतिसुभगस्तातादुदारोऽधिको दीनो जीवति सेवया कलुषभाग्दीर्घायुरिज्येऽष्टमे ॥१५॥ ख्यातः सन् सचिवः शुभेऽर्थसुतवान् स्याद्धर्मकार्योत्सुकः स्वाचारः सुयशा नभस्यतिधनी जीवे महीशप्रियः ।

आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १९१ आयस्थे धनिकोऽभयोऽल्पतनयो जैवातृको यानगो द्वेष्यो धिक्कृतवाग्व्यये वितनयः साघोऽलसः सेवकः ॥१६॥ अब बृहस्पति का द्वादश भाव फल बताते हैं। यदि लग्न में बृहस्पति हो तो शोभावान्, सत्कर्म करने वाला, दीर्घायु और निर्भय हो; उसे पुत्र सुख भी प्राप्त हो। यदि द्वितीय में बृहस्पति हो तो बुद्धिमान्, सुन्दर मुख वाला और वाग्मी (बोलने में कुशल) होता है। ऐसे मनुष्य को उत्तम भोजन प्राप्त होते हैं। अर्थात् द्वितीय भाव से जो-जो बातें देखी जाती हैं उन सबका सुख प्राप्त होता है। यदि तृतीय में बृहस्पति हो तो पापकर्मा, दुष्ट बुद्धि वाला, कृपण और अवज्ञा (अनादर) सहित हो। किन्तु उसका भाई किसी प्रतिष्ठित पद पर पहुंचे या विख्यात हो। मूल में प्रतीतसहज शब्द आया है। इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि जिसका भाई में विश्वास हो। यदि चतुर्थ में बृहस्पति हो तो माता मित्र, भृत्य, पुत्र स्त्री, धान्य आदि का सुख प्राप्त हो और सुखी हो। ॥१४॥ यदि पंचम में बृहस्पति हो तो मिश्रित फल है। जातक बुद्धिमान् और राजा का मन्त्री होता है; किन्तु पुत्रों के कारण क्लेशयुक्त भी होता है। पुत्र उत्पन्न न होना भी क्लेश है, पुत्र का अभाव भी पुत्र- क्लेश है। पुत्र उत्पन्न होने पर नष्ट हो जावें यह भी पुत्रों से क्लेश है, तथा पुत्रों के आचरण से, व्यवहार से क्लेश उठाना पड़े या मन को क्लेश हो यह भी पुत्रों से क्लेश हुआ। छठे में बृहस्पति हो तो शत्रुओं का नाश करने वाला, आलसी, स्वयं अपमान को प्राप्त होने वाला, किन्तु मन्त्राभिचार (मन्त्रों का अनुष्ठान) करने वाला तथा चतुर होता है। यदि सप्तम में बृहस्पति हो तो सत्पत्नीवान् (उत्तम स्त्री *वाग्मी—जिसकी वाक् (बोलने की) शक्ति अच्छी हो उसे वाग्मी कहते हैं।