फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें१७८ फलदीपिका एक टीकाकार यह भी अर्थ करते हैं कि यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो और उस नीच राशि का स्वामी या उस नीच ग्रह का उच्चनाथ उस नीच ग्रह से केन्द्र में हो तो नीच भंग राजयोग होता है। यद्येको नीचगतस्तद्राश्यधिपस्तदुच्चपः केन्द्रे । यस्य स तु चक्रवर्ती समस्तभूपालवन्द्यांघ्रिः ॥२७॥ यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो तो (क) उस नीच राशि का स्वामी और जो ग्रह नीच का है उसका उच्चनाथ यदि दोनों परस्पर केन्द्र में हों तो नीच भंग राजयोग होता है। यहां भी उच्चनाथ के दो अर्थ हो सकते हैं परन्तु हम यही अर्थ लेंगे कि नीच ग्रह जिस राशि में उच्च होता है उस राशि का स्वामी उच्चप या उच्चनाथ कहलावेगा ॥२७॥ यस्मिन्त्राशौ वर्तते खेचरस्तद्राशीशेन प्रेक्षितश्चेत्स खेटः । क्षोणीपालं कीर्तिमन्तं विदध्यात् सुस्थानश्चेत्किंपुनः पार्थिवेन्द्रः ॥ एक अन्य नीच भग राजयोग बताते हैं। जिस राशि में नीच ग्रह हो उस राशि का स्वामी यदि नीच ग्रह को पूर्ण दृष्टि से देखता हो तो नीच भंग राज योग होता है। यदि यह नीच ग्रह ६-८-१२ दुःस्थान में हो तो इतना अच्छा राजयोग नहीं होगा किन्तु यदि सुस्थान में हो तो बहुत उत्तम नीचभंग राजयोग बनता है ॥२८॥ *श्लोक २७ का एक अन्य अर्थ भी हो सकता है। वह यह है कि यदि कोई ग्रह नीच हो तो उस नीच राशि के स्वामी का जो उच्चनाथ है वह उच्चनाथ यदि केन्द्र में हो तो नीच भंग राजयोग होता है, उदाहरण के लिये किसी की कुण्डली में सूर्य नीच राशि का है, तुलाराशि नाथ शुक्र है। शुक्र उच्च होता है मीन में। मीन का स्वामी हुआ बृहस्पति, यह बृहस्पति यदि केन्द्र में हो तो नीच भंग राज योग हुआ।