फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवां अध्याय : राजयोग १७९ नीचे तिष्ठति यस्तदाश्रितगृहाधीशो विलग्नाद्यदा चन्द्राद्वा यदि नीचगस्य विहगस्योच्चर्क्षनाथोऽथवा । केन्द्रे तिष्ठति चेत्प्रपूर्णविभवः स्याच्चक्रवर्ती नृपो धर्मिष्ठोऽन्यमहीशवन्दितपदस्तेजोयशोभाग्यवान् ॥२९॥ यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो तो (क) इस नीच राशि का स्वामी अथवा (ख) नीच ग्रह का उच्चनाथ इन दोनों में से एक भी जन्म लग्न या चन्द्र लग्न से केन्द्र में हो तो नीचभंग राजयोग होता है । ॥ २९ ॥ नीचे यस्तस्य नीचोच्चभेशौ द्वावेक एव वा केन्द्रस्थश्चेच्चक्रवर्ती भूपः स्याद्भूपवन्दितः ॥३०॥ यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो और उस नीच राशि का स्वामी और नीच ग्रह जिस राशि में उच्च होता है उसका स्वामी वह— एक या दोनों लग्न से केन्द्र में हों तो नीचभंग राज योग होता है । नोट : —श्लोक २६ से ३० तक नीच भंग राजयोग दिए गये हैं इनमें कइयों में पुनरावृत्ति है ।