फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १८५ विसुखतनयोऽनर्थप्रायः सुते पिशुनोऽल्पधीः प्रबलमदनः श्रीमान् ख्यातो रिपौ विजयी नृपः । अनुचितकरो रोगार्तोऽस्तेऽध्वगो मृतदारवान् कुतनुरधनोऽल्पायुश्छिद्रे कुजे जननिन्दितः ॥९॥ नृपसुहृदपि द्वेष्योऽतातः शुभ जनघातको नभसि नृपतिः क्रूरो दाता प्रधानजनस्तुतः । धनसुखयुतोऽशोकः शूरो भवे सुशीलः कुजे नयनविकृतः क्रूरोऽदारो व्यये पिशुनोऽधमः ॥१०॥ अब मंगल का द्वादश भाव फल बताते हैं। यदि लग्न में मंगल हो तो अति क्रूर और अति साहसी हो । किन्तु ऐसा व्यक्ति अल्पायु होता है और उसके शरीर में चोट लगती है। यदि द्वितीय भाव में मंगल हो तो या तो चेहरा अच्छा न हो या बोलने में प्रवीण न हो । विद्याहीन, धनहीन हो और कुजन (कुत्सित) आदमियों की नौकरी में रहे । तृतीय में मंगल हो तो गुणवान्, धनवान् सुखी और शूर हो; ऐसे आदमी को दूसरा न दबा सके किन्तु तृतीय में मंगल वाले को छोटे भाइयों का सुख नहीं होता । यदि चतुर्थ में मंगल हो तो मनुष्य मातृ हीन, मित्रहीन, सुख हीन, वाहन हीन, और भूमि हीन हो । कहने का तात्पर्य यह है कि चतुर्थ भाव से जिन-जिन बातों का विचार किया जाता है उन सबके सुख में कमी करे । यदि पंचम में मंगल हो तो सन्तान का सुख न हो; उसके भाग्य में बहुत से अनर्थ (खराबी की बातें) होते रहें । ऐसा व्यक्ति बहुत बुद्धिमान् नहीं होता और चुगल खोर होता है । छठे में मंगल हो तो मनुष्य लक्ष्मीवान्, विख्यात, शत्रुओं को जीतने वाला राजा के समान ऐश्वर्य शाली होता है । छठे में मंगल होने से “प्रबलमदनः” विशेष कामी हो । यदि सप्तम में मंगल हो तो अनुचित कर्म करने वाला, रोग से