फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८४ फलदीपिका यदि चतुर्थ भाव में चन्द्रमा हो तो जातक सुखी, भोगी, त्यागी, अच्छे मित्रों वाला, सवारी के सुख को प्राप्त और यशस्वी होता हैं। यदि पंचम में चन्द्रमा हो तो मृदु गति* वाला, मेधावी (बुद्धिमान्) और अच्छे पुत्र वाला हो। ऐसा व्यक्ति राजा का मन्त्री होता है । यदि छठे में चन्द्रमा हो तो मनुष्य अल्पायु, बुद्धि हीन और उदर रोगी हो और परिभव (अपमान या हार) को प्राप्त हो । यदि सप्तम स्थान में चन्द्रमा हो तो स्वयं सौम्य और सुन्दर हो और श्रेष्ठ पत्नी का प्यारा हो (अर्थात् उसकी पत्नी भी बहुत सुन्दर हो और पति-पत्नी में प्रेम भी हो)। यदि अष्टम में चन्द्रमा हो तो जातक रोगी और अल्पायु होता है चन्द्रमा नवम में हो तो जातक शुभ धर्मा (शुभ धार्मिक आचरण करने वाला) होगा और उसके पुत्र भी होंगे। यदि दशम में चन्द्रमा हो तो ऐसा जातक विजयी होता है; जिस काम में वह हाथ लगाता है उसमें प्रारम्भ में ही सफलता हो जाती है। ऐसा व्यक्ति शुभ कर्म करने वाला और सज्जनों के साथ उपकार करने वाला होता है । यदि चन्द्रमा ग्यारहवें भाव में हो तो मनुष्य मनस्वी, दीर्घायु, धनवान्, पुत्रवान्, होता है । और उसे नौकर का भी सुख प्राप्त होता है । व्यय भावगत चन्द्रमा का निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति आलसी, अपमानित, दुःखी होता है और उससे अन्य द्वेष करते हैं। क्षततनुरतिक्रूरोऽल्पायुस्तनौ घनसाहसी वचसि विमुखो निर्विद्यार्थः कुजे कुजनाश्रितः । सुगुणधनवाञ्छूरोऽधृष्यः सुखी व्यनुजोऽनुजे सुहृदि विसुहृन्मातृक्षोणीसुखालयवाहनः ॥८॥
- गति से अभिप्राय पैदल चलने का है । ** हमारे विचार से अन्य राजयोग होंगे तभी राज मन्त्री होगा ।