भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

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आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १८३ धनाढ्योऽन्तर्वाणिविषयसुखवान् वाचि विकलः सहोत्थे सभ्रातृप्रमदबलशौर्योऽतिकृपणः ॥५॥ सुखी भोगी त्यागी सुहृदि ससुहृद्वाहनयशाः सुपुत्रो मेधावी मृदुगतिरमात्यः सुतगते । क्षतेऽल्पायुश्चन्द्रेऽमतिरुदररोगी परिभवी स्मरे दृष्टेः सौम्यो वरयुवतिकान्तोऽतिसुभगः ॥६॥ मृतौ रोग्यल्पायुस्तपसि शुभधर्मात्मसुतवान् जयी सिद्धारम्भो नभसि शुभकृत्सत्प्रियकरः । मनस्वी बह्वायुर्धनतनयभृत्यैः सह भवे व्यये द्वेष्यो दुःखी शशिनि परिभूतोऽलसतमः ॥७॥ यदि शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा लग्न में हो तो मनुष्य निर्भय, दृढ़ शरीर वाला, बलिष्ठ, लक्ष्मीवान् और दीर्घायु होता है। किन्तु यदि कृष्ण पक्ष का चन्द्रमा हो तो इसका विपरीत फल समझना चाहिये*। यदि चन्द्रमा धन स्थान में हो तो मनुष्य मृदु वचन बोलने वाला, विषय सुखवान् (सांसारिक विषयों में सुख उठाने वाला) और धनाढ्य होता है। किन्तु उसकी वाणी में कुछ विकलता होती हैं। यदि तृतीय भाव में चन्द्रमा हो तो भाइयों का सुख हो; ऐसा व्यक्ति मदयुक्त, बली और शूर किन्तु अत्यन्त कृपण होता है ॥ ५ ॥

  • शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होता है इस कारण इसका शुभ फल दिया है किन्तु यदि चन्द्रमा क्षय को प्राप्त हो तो इसका दुष्ट फल होता है।