भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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१८२ फलदीपिका विजयी और गुणवान् होता है । यदि सूर्य सप्तम में हो तो कुतन (ख़राब शरीर वाला—शरीर में कोई विकार हो) ऐसा व्यक्ति राज विरुद्ध कार्य करता है अर्थात् सरकार का विरोध करता है । ऐसा मनुष्य व्यर्थ घूमता है और अपमान को प्राप्त होता है । सप्तम में सूर्य स्त्री सुख को भी नष्ट करता है । यदि अष्टम में सूर्य हो तो धन नष्ट हो, आयु नष्ट हो (अल्पायु हो) उसके मित्र नष्ट हों (मित्र न रहें) और विगत दृष्टि हो अर्थात् नेत्रों की ज्योति मन्द पड़ जावे । हमने सैकड़ों कुण्डलियों में देखा है अष्टम का सूर्य दक्षिण* नेत्र को बहुत बिगाड़ता है ॥ ३ ॥ यदि सूर्य नवम भाव में हो तो पिता से हीन हो अर्थात् कम उम्र में ही पिता का सुख न रहे । दक्षिण भारत में नवम भाव से पिता का विचार किया जाता है । इस कारण सूर्य का नवम भाव स्थित होने का पितृ कष्ट फल लिखा है । नवम में सूर्य सन्तान सुख और बन्धु सुख देता है । ऐसा व्यक्ति ब्राह्मण और देवताओं का आदर करता है । यदि दशम में सूर्य हो तो जातक को सन्तान सुख, सवारियों का सुख हो । ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान्, लक्ष्मीवान्, बलवान् और यशस्वी होता है । लोग उसकी प्रशंसा करते हैं और वह राजा के समान वैभवशाली होता है । यदि ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो मनुष्य धनी और दीर्घायु हो; ऐसे व्यक्ति को शोक नहीं होता अर्थात् वह सुखी रहता है । और बहुत से आदमियों के ऊपर हुकूमत करता है । यदि बारहवें घर में सूर्य हो तो अपने पिता से शत्रुता करे । ऐसा जातक नेत्र रोग से युक्त होता है । हमारे विचार से बाएँ नेत्र में विशेष कमजोरी होनी चाहिए । ऐसा जातक धनहीन , पुत्रहीन भी होता है ॥ ४ ॥ सिते चन्द्रे लग्ने दृढतनुरदभ्रायुरभयो बलिष्ठो लक्ष्मीवान् भवति विपरीतं क्षयगते ।

  • दक्षिण = दाहिना