फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १८१ यदि जन्म के समय सूर्य लग्न में हो तो जातक बहुत थोड़े केश वाला, कार्य करने में आलसी, क्रोधी, प्रचण्ड, लम्बा, मानी (घमण्डी) शूर, क्रूर, क्षमा न करने वाला होगा । उसके नेत्र रूखे होंगे । यदि जन्म लग्न कर्क हो और उसमें सूर्य हो तो मनुष्य स्फोटाक्ष होता है—यदि मेष में स्थित सूर्य लग्न में हो तो भी उसे नेत्र रोग होता है (तिमिर रोग) यदि सिंह राशि का सूर्य लग्न में हो तो उसे रात्रि में नहीं दीखता । यदि तुला राशि का सूर्य लग्न में हो तो बहुत अनिष्ट फल होते हैं । मनुष्य दरिद्री रहता है और उसके पुत्र नष्ट हो जाते हैं । ॥१॥ यदि सूर्य द्वितीय में हो तो मनुष्य विद्या, विनय, और धन से हीन होता है; उसकी वाणी में भी दोष होता है । हकलाना या इसी प्रकार का दोष हो । यदि सूर्य तृतीय में हो तो मनुष्य बलवान् शूरवीर,, धनी और उदार होता है, किन्तु अपने (सम्बन्धी) लोगों से शत्रुता रखता है । यदि चौथे स्थान में सूर्य हो तो सुख हीन, बन्धु- हीन, मित्रहीन और भूमिहीन हो । मकान हीन भी हो । चतुर्थ से इन सब बातों का विचार किया जाता है और क्रूर ग्रह के बैठने का यह फल है । ऐसा व्यक्ति अपने पिता से पाई हुई जायदाद या सम्पत्ति को व्यय कर देता है । और राजा (सरकार) की सेवा करता है ॥ २ ॥ अगर सूर्य पंचम में हो तो सुख हीन, धन हीन, आयु हीन और सुत हीन हो । यह हमारा बहुत बार का देखा हुआ अनुभव है कि पंचम भाव का सूर्य जेष्ठ पुत्र का नाश करता है । किन्तु जातक बुद्धिमान् होता है और जंगल में घूमने का शौकीन होता है । यदि षष्ठ स्थान में सूर्य हो तो मनुष्य राजा के समान श्रेष्ठ वैभव वाला, प्रसिद्ध, धनी,
- स्फोट का अर्थ होता हैं कोई व्रण, घाव, फोड़ा या नेत्रों का फूलना कोई फूला आदि । कहने का तात्पर्य यह है कि लग्न में मेष, कर्क, और सिंह का सूर्य नेत्र रोग देता है ।