भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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१८८ फलदीपिका यदि मंगल नवम में हो तो मनुष्य चाहे राजा का प्यारा भी हो ऐसे व्यक्ति से अन्य लोग द्वेष करते हैं, उसे पिता का सुख प्राप्त नहीं होता और ऐसा व्यक्ति जन घातक (जो जनों का घात करे या पीड़ा पहुँचाए) होता है। यदि दशम में मंगल हो तो आदमी क्रूर, दाता, राजा के समान, पराक्रमी हो और वड़े मुख्य आदमी भी उसकी प्रशंसा करें। ११ वें स्थान में मंगल हो तो मनुष्य धनवान्, सुखवान्, शूर, सुशील और शोक रहित होता है। यदि द्वादश में मंगल हो तो ऐसा आदमी चुगल खोर, क्रूर, अदार (पत्नी रहित) और अधम होता है। ऐसे व्यक्ति के नेत्र में भी विकार होता है। ॥१०॥ अब बुध का द्वादश भाव फल बताते हैं। दीर्घायुर्जन्मनि ज्ञे मधुरचतुरवाक् सर्वशास्त्रार्थबोधः स्याद्बुद्ध्योपार्जितस्वः कविरमलवचा वात्रि मिष्टान्नभोक्ता । शौर्ये शूरः समायुः सुसहजसहितः सश्रमो दैन्ययुक्तः संख्यावान् चाटुवाक्यः सुहृदि सुखसुहृत्क्षेत्रधान्यार्थभोगी ॥११॥ विद्यासौख्यप्रतापः प्रचुरसुतयुतो मान्त्रिकः पञ्चमस्थे जातक्रोधो विवादैर्द्विषि रिपुबलहन्तालसो निष्ठुरोक्तिः । प्राज्ञोऽस्ते चारुवेषः ससकलमहिमा याति भार्या सवित्तां विख्याताख्यश्चिरायुः कुलभृदधिपतिर्ज्ञेऽष्टम दण्डनेता ॥१२॥ विद्यार्थाचारधर्मैः सह तपसि बुधे स्यात्प्रवीणोऽतिवाग्मी सिद्धारम्भः सुविद्याबलमतिसुखसत्कर्मसत्यान्वितः खे । *हमारा ऐसा अनुभव है कि अष्टम या द्वादश में मंगल होने से मनुष्य प्रायः ऋणी रहता है। अष्टम में मंगल बवासीर, भगन्दर, या अन्य गुदा रोग भी करता है।