फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १८९ बह्वायुः सत्यसन्धो विपुलधनसुखी लाभगे भृत्ययुक्तो दीनो विद्याविहीनः परिभवसहितोऽन्त्ये नृशंसोऽलसश्च ॥१३॥ यदि लग्न में बुध हो तो ऐसा व्यक्ति सब शास्त्रों में विद्वान्, मधुर और चतुर वाणी बोलने वाला और दीर्घायु होता है। यदि द्वितीय में बुध हो तो अपनी बुद्धि से धनोपार्जन करता है। कवि (बुद्धिमान् या कविता करने वाला) होता है और उसकी वाणी निर्मल होती है और उसे भोजन में मिष्टान्न प्राप्त होते रहते हैं। यदि तृतीय में बुध हो तो मनुष्य शूरवीर हो किन्तु मध्यायु हो। उसके अच्छे भाई बहिन हों परन्तु ऐसे व्यक्ति को श्रम बहुत करना पड़ता है और दैन्ययुक्त होता है। यदि चतुर्थ में बुध हो तो मनुष्य विद्वान्, चाटु वाक्य कहने वाला (जो वचन दूसरों को प्रसन्न करें उन्हें चाटु वाक्य कहते है) होता है। उसे मित्र, क्षेत्र, धान्य, धन ओदि का भोग भी प्राप्त होता है और सुखी होता है। ॥११॥ पञ्चम में बुध हो तो उसके सुख और प्रताप की वृद्धि विद्या के कारण होती है; उसके बहुत सुत होते हैं और ऐसा व्यक्ति मन्त्र शास्त्र का ज्ञाता होता है। यदि छठे में बुध हो तो मनुष्य आलसी निष्ठुर वचन बोलने वाला, अपने शत्रुओं के बल को हनन (नाश) करने वाला किन्तु विवाद करने में ऐसे मनुष्य को बहुत जल्दी और बहुत अधिक क्रोध होजाता है। यदि सप्तम में बुध हो तो ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान् सुन्दर वेष वाला, महामहिमाशाली (सकल महिमा को प्राप्त) होता है और उसकी पत्नी धनिक होती है अर्थात् धनी कुल में विवाह होता और दहेज मिलता है। यदि अष्टम में बुध हो तो मनुष्य दण्ड नेता *दीनता के भाव को दैन्य कहते हैं। **जिसे राज्य से ऐसा अधिकार प्राप्त हो कि औरों को दण्ड दे सके ।