भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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दसवां अध्याय : कलत्रभाव २२३ पुरुष की कुंडली में यह देखिये कि (१) सप्तम भाव में कौन सी राशि है (२) सप्तमेश किस राशि में है (३) शुक्र किस राशि में है। इन तीनों राशियों में से किसी राशि की दिशा में विवाह होगा। अर्थात् उस दिशा में रहने वाली लड़की से विवाह होगा। लग्नेश जिस राशि या नवांश में हो-उससे त्रिकोणराशि में जब गोचर वश शुक्र वा सप्तमेश आता है तब विवाह होता है ॥१२॥ (१) जो ग्रह लग्न से सप्तम हो (२) जो ग्रह सप्तम भाव को देखता हो (३) सप्तमेश-इन तीनों की जब दशा* हो और लग्नेश गोचर वश सप्तम स्थान में आवे तब विवाह का योग होता है ॥१३॥ जिस राशि में सप्तमेश हो उस राशि का स्वामी तथा जिस नवांश में सप्तमेश हो उसका स्वामी-इन दोनों में तथा शुक्र और चन्द्र इन दोनों में कौन बलवान् है? जब इस बलवान् ग्रह को दशा (या अन्तर्दशा हो) और सप्तमेश जिस राशि या नवांश में है-उससे त्रिकोण राशि में गोचर वश बृहस्पति आवे तो विवाह का योग होता है ॥१४॥ यदि सातवें घर का स्वामी नीच राशि में, शत्रु राशि में, अस्त या पाप ग्रह से दृष्ट हो और सप्तम भाव में पाप ग्रह हो या सप्तम भाव को पाप ग्रह देखते हों तो कलत्र (स्त्री) हानि होती है, ऐसा विद्वानों का मत है । ॥ १५ ॥ दशा से महादशा तथा अन्तर्दशा दोनों समझना।