भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 228

ग्यारहवां अध्याय : स्त्री जातक २२७ गशि और सत् (अच्छा, शुभग्रह का, शुभयुक्त शुभदृष्ट) नवांश हो तो उस स्त्री को सौन्दर्य, यश, विद्या, तथा धन से युक्त पति मिलेगा। यदि इसका उलटा हो अर्थात् सप्तम भाव मध्य पर अशुभ राशि, अशुभ नवांश हो तो कुतनु (कुत्सित शरीर वाला) मूर्ख, चालाक, निर्धन पति होगा और उनका (पति पत्नी) का वियोग भी होगा (एक साथ न रहें या मृत्यु के कारण)। यदि सप्तम में मंगल हो तो विधवा हो, यदि शुभ और पाप दोनों प्रकार के ग्रह सप्तम में हों तो पुनर्विवाह करे। यदि अष्टम में क्रूर ग्रह हों तो पति की आयु का हरण करती हैं अर्थात् पति अल्पायु होता है किन्तु यदि द्वितीय भाव में (लग्न से दूसरे) अशुभ ग्रह हों तो स्त्री की स्वयं की मृत्यु हो जाती है। हमारा अनुभव है कि वर और कन्या यदि दोनों की कुंडली में मंगल, शनि, राहु, केतु, सूर्य का दोष बराबर हो तो दोनों कुंडलियों एक दूसरे के दोष को काट देती हैं ॥३॥ यदि पंचम भाव में वृष, सिंह, कन्या या वृश्चिक राशि हो और उसमें चन्द्रमा हो तो उस स्त्री के थोड़ी संतान हों। सप्तम भाव मध्य मंगल या शनि की राशि या मंगल या शनि के नवांश में हो तो उसकी योनि में रोग हो। यदि चतुर्थ स्थान में पाप ग्रह हों तो कुलटा हो, यदि लग्न, चन्द्र और शुक्र मंगल या शनि के राशि और अंश में हों तो पुंश्चली (व्यभिचारिणी) हो ॥४॥ यदि सप्तम भाव मध्य शुभ ग्रह की राशि और नवांश में हो तो सुन्दर जघन (कमर के नीचे जांघों के बीच का भाग जघन कहलाता है) वाली, मंगल वती (पति सुख सम्पन्न) होती है। यदि लग्न चतुर्थ और चन्द्रमा का शुभ ग्रहों से सम्बन्ध हो तो सच्चरित्रा, अनेक गुणों से युक्त हो, यदि त्रिकोणों में (पांचवे तथा नवम घर में) सौम्यग्रह हों, तो सुखी, पुत्रवती, गुणवती, सम्पत्ति-शालिनी हो । यदि उपर्युक्त घरों में निर्बल क्रूर ग्रह हों तो बाँझ हो या उसकी सन्तति अल्पायु हो ॥ ५ ॥