फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबारहवां अध्याय पुत्रभाव फल सुस्था विलग्नशशिनोः सुतभेशजीवाः सुस्थाननाथशुभदृष्टियुते सुतर्क्षे । लग्नात्मपौ यदि युतौ च मिथः सुदृष्टौ क्षेत्रे परस्परगतौ यदि पुत्रसिद्धिः ॥१॥ यदि लग्न से पांचवे भाव का स्वामी, चन्द्रमा से पांचवे स्थान का स्वामी और बृहस्पति अच्छे स्थानों में बैठे हों और पंचम भाव पर पंचमेश की तथा शुभ-ग्रहों की दृष्टि हो तथा चतुर्थ, नवम, आदि के शुभ ग्रह स्वामियों की दृष्टि हो और छठे, आठवे, बारहवे घर के स्वामी की दृष्टि पाँचवे घर पर न हो और लग्नेश, पंचमेश एक साथ बैठे हों या एक दूसरे के घर में बैठ हों या लग्नेश, पंचमेश में परस्पर मित्र दृष्टि हो तो पुत्रसिद्धि होती है । अर्थात् यह सब योग पुत्रकारक हैं । ।। १ ।। लग्नामरेड्यशशिनां सुतभेषु पापै र्युक्तेक्षितेष्वथ शुभैरयुतेक्षितेषु । पापोभयेषु सुतभेषु सुतेश्वरेषु दुस्थानगेषु न भवन्ति सुताः कथंचित् ॥२॥ अब नीचे वह योग दिये जाते हैं जिनके कारण सन्तान नहीं होती या होकर नष्ट हो जाती है । अर्थात् निम्नलिखित योग सन्तान के बाधाकारक हैं ।