भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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२३० फलदीपिका। स्त्री का मासिक धर्म जब प्रारंभ हो (प्रथम बार ही नहीं-कभी- भी, तब यदि चन्द्रमा गोचर वश जन्म कुंडली में अनुपचय (पहले, दूसरे, चौथे, पांचवे, सातवें, आठवे, नवें बारहवें स्थान में हो और मंगल से देखा जाता हो तो उस महीने उसको गर्भ रह सकता है । यदि चन्द्रमा ऐसे स्थान में नहीं है तो उसे उस महीने में गर्भ नहीं रहेगा । यदि चन्द्रमा पुरुष की जन्म कुंडली में उपचय स्थान (३, ६, १०, ११) में हो और उसे गुरु देखता ही उस समय गर्भाधान करे । गर्भाधान त्याज्य समय बचाकर करना चाहिये । धर्मशास्त्र में यह बताया गया है कि कौन-कौन से समय त्याज्य है—यथा एकादशी, अमावास्या पूर्णिमा, माता, पिता का श्राद्ध दिन आदि । ऐसे लग्न में —जिस पर शुभ दृष्टि अधिक हो और जब चन्द्रमा पर भी शुभग्रहों की दृष्टि अधिक हो गर्भाधान करना श्रेयस्कर है ॥ ११ ॥