भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 230

ग्यारहवां अध्याय : स्त्रीजातक २२९ में हो तो असती और शुक्र के त्रिंशांश में हो निस्सन्तान ओर दरिद्रा होती है । (७) यदि सिंह राशि में हो ओर मंगल के त्रिंशांश में हो तो दुष्ट भार्या, शनि के त्रिंशांश में हो तो आचरण हीन, गुह के त्रिंशांश में हो तो राजा या जमींदार की पत्नी, यदि बुध के त्रिंशांश में हो तो मर्दाना (स्त्रियोचित चेष्टा के विरुद्ध) और शुक्र के त्रिंशांश में हो तो अन्य पुरुष में आसक्त होती है । ॥ ६-८ ॥ नीचे कुछ नक्षत्रों में उत्पन्न कन्या किन-किन के लिए अनिष्ट होती हैं यह बताया जाता है : ज्येष्ठा में उत्पन्न कन्या पति के बड़े भाई की मृत्यु करे, आश्लेषा में उत्पन्न सास के लिये घातक, मूल में उत्पन्न ससुर के लिये अनिष्ट और विशाखा में उत्पन्न देवर के लिये घातक । जो कन्याएँ चित्रा, आर्द्रा, आश्लेषा, शतभिषा ज्येष्ठा, मूल, कृत्तिका या पुष्य नक्षत्र में उत्पन्न होती हैं वे वंध्या, विधवा, मृतसुता (जिसके बच्चे मर जावें), स्वामी से परित्यक्ता (पति छोड़ दे) या निर्धना होती हैं ॥ ९ ॥* यदि लग्नेश, सप्तमेश, नवमेश और जिस राशि में चन्द्रमा है उस का स्वामी शुभग्रहों के उत्तम स्थानों में स्थित हों ओर अस्त न हों तो स्त्री भाग्यशालिनी, सुन्दरी, बंधुओं में पूज्य और पुण्य कर्म करने में कुशल होती है । वह अपने पति का प्रिय करने वाली, कल्याण- शीला, सच्चरित्रा, सत्पुत्रवती होती है । अष्टम भाव पर जितने अधिक शुभ ग्रहों की दृष्टि होगी उतने ही अधिक काल तक वह सुमंगली (सधवा) रहेगी ॥ १० ॥ *हमारे विचार से नक्षत्र में उत्पन्न होने का, फल का, जन्म कुंडली के अन्य ग्रहों के फल से तारतम्य कर किसी परिणाम पर पहुँचना उचित है।