फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबारहवां अध्याय : पुत्रभाव फल २३३ सूर्ये चाल्पसुतर्क्षगे निधनगे मन्दे कुजे लग्नगे लग्नाष्टव्ययगैः शनीड्यरुधिरैश्चाल्पात्मजर्क्षे सुते । चन्द्रे' लाभगते गुरुस्थितसुतस्थाने सपापे भवे- ल्लग्नेऽनेकखगान्विते तनयभाक्कालान्तरे यत्नतः ॥४॥ इस श्लोक में तीन पृथक्-पृथक् योग बताये गये हैं । इन तीनों योगों में से यदि कोई भी योग हो तो जातक के बहुत काल के बाद (जवानी बीत जाने पर) और बहुत यत्न करने पर पुत्र होता है : (क) पंचम में अल्पसुत राशि हो और उसमें सूर्य हो, शनि आठवें घर में हो और मंगल लग्न में हो । (ख) शनि लग्न में हो, बृहस्पति अष्टम में हो और मंगल बारहवें घर में तथा पाँचवें घर में अल्पसुत राशि हो । (ग) चन्द्रमा ग्यारहवें हो, बृहस्पति से पाँचवें घर में पापग्रह हो और लग्न में कई ग्रह हों ।* ॥४॥ सूर्ये नान्ययुते सुतर्क्षसहिते चन्द्रस्य गेहे स्थिते भौमे वा भृगुजेऽपि वा सति सुतप्राप्ति द्वितीयस्त्रियाम् । मन्दे वा बहुपुत्रवाञ्छ्छशिनि वा सौम्येऽपि वाल्पात्मजो देवेड्ये' बहुदारिका शशिगृहे तद्वत्सुताधिष्ठिते ॥५॥ (क) यदि सूर्य अकेला ही कर्क राशि में स्थित होकर पाँचवें घर में हो । या (ख) मंगल अकेला कर्क राशि में पंचम में हो । या (ग) कक राशि का शुक्र अकेला पंचम में हो । तो दूसरा विवाह करने पर पुत्र प्राप्ति होती है। यदि कर्क राशि
- वृष, सिंह, कन्या, और वृश्चिक अल्पसुत राशि है ।