भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 684 में से

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२३४ फलदीपिका में स्थित होकर शनि अकेला पंचम में हो तो बहुत पुत्र होंगे। यदि कर्क राशि का बुध अकेला पंचम में हो तो थोड़े पुत्र हों। यदि स्वराशि का चन्द्रमा पंचम स्थान में हो और चन्द्रमा के साथ दूसरा कोई ग्रह न हो तो भी थोडे पुत्र हों। किन्तु यदि एकाकी (अकेला) बृहस्पति अपनी उच्च राशि में स्थित होकर पंचम में हो तो जातक के बहुत सी कन्या होती हैं ॥५॥ सुखास्तदशमस्थितैरशुभकाव्यशीतांशुभि- र्व्ययाष्टतनयोदयेष्वशुभगेषु वंशक्षयः । मदे कविविदौ मतौ गुरुरसद्भिरंबुस्थितैः सुते शशिनि नैधनव्ययतनुस्थपापैरपि ॥६॥ नीचे चार योग दिये जाते हैं। इन चारों में से कोई भी योग हो तो जातक का वंश आगे नहीं चलता। (i) चतुर्थ में अशुभ ग्रह हों, सातवें शुक्र हो और दसवें घर में चन्द्रमा हो। (ii) पहले, पांचवें, आठवें और बारहवें घर में अशुभ ग्रह हों। (iii) सातवें घर में बुध और शुक्र हो, बृहस्पति पाँचवे हो और क्रूर-ग्रह चौथे घर में हो। (iv) चन्द्रमा पांचवें हो और पहले, आठवें तथा बारहवें घर में पापग्रह हों ॥६॥ पापे लग्ने लग्नपे पुत्रसंस्थे धीशे वीर्ये वेश्मनोन्दावपुत्रः । ओजर्क्षेऽंशे पुत्रगे सूर्यदृष्टे चन्द्रे पुत्रक्लेशभाक् स्यादसूनुः ॥७॥

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