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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

२३४ फलदीपिका में स्थित होकर शनि अकेला पंचम में हो तो बहुत पुत्र होंगे। यदि कर्क राशि का बुध अकेला पंचम में हो तो थोड़े पुत्र हों। यदि स्वराशि का चन्द्रमा पंचम स्थान में हो और चन्द्रमा के साथ दूसरा कोई ग्रह न हो तो भी थोडे पुत्र हों। किन्तु यदि एकाकी (अकेला) बृहस्पति अपनी उच्च राशि में स्थित होकर पंचम में हो तो जातक के बहुत सी कन्या होती हैं ॥५॥ सुखास्तदशमस्थितैरशुभकाव्यशीतांशुभि- र्व्ययाष्टतनयोदयेष्वशुभगेषु वंशक्षयः । मदे कविविदौ मतौ गुरुरसद्भिरंबुस्थितैः सुते शशिनि नैधनव्ययतनुस्थपापैरपि ॥६॥ नीचे चार योग दिये जाते हैं। इन चारों में से कोई भी योग हो तो जातक का वंश आगे नहीं चलता। (i) चतुर्थ में अशुभ ग्रह हों, सातवें शुक्र हो और दसवें घर में चन्द्रमा हो। (ii) पहले, पांचवें, आठवें और बारहवें घर में अशुभ ग्रह हों। (iii) सातवें घर में बुध और शुक्र हो, बृहस्पति पाँचवे हो और क्रूर-ग्रह चौथे घर में हो। (iv) चन्द्रमा पांचवें हो और पहले, आठवें तथा बारहवें घर में पापग्रह हों ॥६॥ पापे लग्ने लग्नपे पुत्रसंस्थे धीशे वीर्ये वेश्मनोन्दावपुत्रः । ओजर्क्षेऽंशे पुत्रगे सूर्यदृष्टे चन्द्रे पुत्रक्लेशभाक् स्यादसूनुः ॥७॥

बारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २३५ नीचे दो योग दिये जाते हैं। यदि इन दोनों में से कोई योग हो तो जातक के पुत्र न हो या पुत्र के कारण क्लेश हो। (i) पाप-ग्रह लग्न में हो, लग्नेश पंचम में हो, पंचमेश तीसरे घर में हो और चन्द्रमा चौथे घर में। इस योग से पुत्र नहीं होता। (ii) चन्द्रमा ओज राशि और ओज अंश में स्थित होकर पांचवे घर में हो और सूर्य से देखा जाता हो। यह योग होने से या तो पुत्र न हो या पुत्र के कारण क्लेश हो।¹ ॥७॥ मान्दं सुतर्क्षं यदि वाऽथबौधं मान्द्यर्कपुत्रान्वितवीक्षितं चेत् । दत्तात्मजः स्यादुदयास्तनाथ- संबन्धहीनो विबलः सुतेशः ॥८॥ नीचे दो योग दिये जाते हैं। इन दोनों योगों में से यदि कोई योग हो तो जातक के औरस पुत्र नहीं होते किन्तु वह लड़का गोद लेता है। अपने शरीर से, अपनी भार्या में जो पुत्र होता है वह औरस कहलाता है। (i) यदि पंचम भाव पर मिथुन, कन्या, मकर या कुम्भराशि हो और मान्दि² या शनि वहां बैठे हों या पंचम को देखते हों। (ii) यदि पंचमेश निर्बल हो और लग्नेश तथा सप्तमेश से कोई सम्बन्ध न करे ॥८॥ नीचारिमूढोपगते सुतेशे रिःफारिरन्ध्राधिपसंयुते वा ।

१. मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ ओज राशि कहलाती हैं। २. मान्दि को गुलिक भी कहते हैं।

२३६ फलदीपिका सुतस्य नाशः कथितोऽत्र तज्ज्ञैः शुभैरदृष्टे सुतभे सुतेशे ॥६॥ यदि पांचवें घर का मालिक नीच राशि में हो, शत्रु राशि में हो, या अस्त हो, या षष्ठेश, व्ययेश अथवा अष्टमेश के साथ हो तो सन्तान नष्ट होती है। किन्तु यदि पंचमेश और पंचमभाव को शुभ-ग्रह देखें तो सन्तान नष्ट नहीं होगी ॥९॥ सुतनाथजीवकुजभास्करेषु वै पुरुषांशकेषु च गतेषु कुत्रचित् । मुनयो वदन्ति बहुपुत्रतां सदा सुतनाथवीर्यवशतः सुपुत्रताम् ॥१०॥ यदि पांचवे घर का स्वामी, बृहस्पति, मंगल और सूर्य यह चाहे कहीं भी हों किन्तु पुरुष नवांश में हो तो मुनियों का मत हैं कि ऐसे व्यक्ति के बहुत पुत्र होते हैं। यदि पंचमेश बली होगा तो सुपुत्र होंगे; यदि पंचमेश निर्बल होगा तो कुपुत्र होंगे। * ॥१०॥ पुंराश्यंशेऽधीशवरे पुंग्रहेन्द्रै- र्युक्ते दृष्टे पुंग्रहे पुंप्रसूतिः । स्त्रीराश्यंशे स्त्रीग्रहैर्युक्तदृष्टे स्त्रीणां जन्म स्यात्सुतर्क्षे सुतेशे ॥११॥ किसी व्यक्ति के कन्या विशेष होंगी या पुत्र विशेष इसका सिद्धांत इस श्लोक में बताया गया है। यदि पंचम भाव पुरुष राशि, पुरुष अंश ** मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ पुरुष राशि या पुरुष नवांश कहलाते हैं। वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर तथा मीन स्त्रीराशि या स्त्री नवांश हैं।

बारहवां अध्याय : पुत्रभाव फल २३७ में स्थित हो और पंचम में पुरुष-ग्रह बैठे हों या पंचम को पुरुषग्रह देखते हों और पंचमेश भी पुरुष राशि, पुरुष अंश में स्थित हो तथा पुरुष-ग्रहों द्वारा देखा जाता हो या पुरुषग्रहों के साथ हो तो पुत्र होंगे। किन्तु यदि पंचम भाव में स्त्री राशि, स्त्री नवांश हो, पंचम में स्त्री ग्रह बैठे हों या स्त्री ग्रह पंचम को देखते हों और पंचमेश स्त्री-राशि, स्त्री-नवांश में स्थित हो, स्त्री-ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो कन्यायें होंगी। प्रायः सब बातें किसी कुण्डली में पूर्ण रूप से घटित नहीं होतीं इसलिये मिला-जुला प्रभाव होता है। ॥ ११ ॥ बलयुक्तौ स्वगृहांशेष्वर्कसितावुपचयर्क्षगौ पुंसाम् । स्त्रीणां वा कुजचन्द्रौ यदा तदा संभवति गर्भः ॥१२॥ यदि पुरुष की कुण्डली में सूर्य और शुक्र अपने गृह और अपने अंश में बलवान् होकर उपचय स्थानों में जा रहे हों और स्त्री की कुण्डली में मंगल और चन्द्रमा अपने घर और अंश में बलवान् होकर उपचय स्थान में जा रहे हों तो गर्भ रहता है ॥ १२ ॥ अशत्रु नीचारिनवांशकैः सुते सुतेशयुक्तैरपि तैस्तथाविधैः । सुतर्क्षगैर्वा गुरुभादिनांशकात्सुते फलैः पुत्रमितिर्विचिन्त्यते ॥१३॥ इस श्लोक में यह देखना बताया गया है कि कितने पुत्र होंगे। लग्न से १, २, ४, ५, ७, ८, ९, १२ स्थान अपचय स्थान कहलाता लग्न से ३, ६, १०, ११ उपचय स्थान कहलाता है।

२३८ फलदीपिका यह देखिये कि कौन से ग्रह पांचवें घर में बैठे हैं या पांचवे घर के स्वामी के साथ बैठे हैं और उनमें से कितने ऐसे हैं जो मित्र, नीच और शत्रु नवांश में है। इसी प्रकार यह विचारिये कि बृहस्पति से पंचम स्थान में कौन-कौन से ग्रह हैं--वे तथा बृहस्पति से पंचम स्थान का स्वामी मित्र नवांश में है या नहीं। यह भी देखना चाहिये कि सूर्य जिस नवांश में है उससे पंचम में जो ग्रह है या उससे पंचम का जो स्वामी है यह सब मित्र नवांश में हैं या नहीं ॥१३॥ जीवेन्दुक्षितिजस्फुटैक्यभवने युग्मे च युग्मांशके स्त्रीणां क्षेत्रबलं वदन्ति सुतदं मिश्रे प्रयासात्फलम् भास्वच्छुक्रगुरुस्फुटैक्यभवनेप्योजांशकेऽप्योजभे पुंसां बीजबलं सुतप्रदमिमं मिश्रे तु मिश्रं वदेत् ॥१४॥ इस श्लोक में यह बताया गया है कि किसी पुरुष की जन्मकुण्डली देखकर यह कैसे बताना कि इस पुरुष के वीर्य में सन्तान उत्पन्न करने की ताक़त है या नहीं और किसी स्त्री की जन्मकुण्डली देखकर यह कैसे बताना कि इसमें सन्तान उत्पन्न करने की ताक़त है या नहीं। पहले पुरुष की कुण्डली का विचार किया गया है। पुरुष की कुण्डली में सूर्य-स्पष्ट, शुक्र-स्पष्ट और वृहस्पति-स्पष्ट अर्थात् सूर्य, वृहस्पति, शुक्र इन तीनों ग्रहों की राशि, अंश, कला, विकला जोड़ लीजिए। इनके जोड़ने पर यदि ऊनी राशि, ऊना नवांश आवे तो समझिये कि इस पुरुष के वीर्य में पुत्र उत्पन्न करने की पूर्ण क्षमता है। यदि राशि और नवांश इनमें से एक ऊना, एक पूरा आवे तो मिलाजुला फल समझिये और यदि सम राशि, सम नवांश आवे तो समझिये कि इस पुरुष में पुत्रोत्पत्ति की क्षमता नहीं है। यदि स्त्री की कुण्डली का विचार करना हो तो उसकी कुण्डली का चन्द्र स्पष्ट, मंगल-स्पष्ट और बृहस्पति-स्पष्ट (अर्थात् इन

बारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २३९ तीनों ग्रहों की राशि, अंश, कला, विकला जोड़िये) जो जोड़ आवे वह यदि सम राशि, सम नवांश में हो तो उस स्त्री में सन्तान उत्पन्न करने की पूर्ण क्षमता समझनी चाहिए। राशि और नवांश इन दोनों में एक सम, एक विषम आवे तो आधी क्षमता और दोनों विषम आवें तो पूर्ण अक्षमता समझनी चाहिये ॥१४॥ पञ्चाघ्नाच्छशिनः स्फुटादिषुहतं भानुस्फुटं शोधये- न्नीत्वा तत्र तिथिं सिते शुभतिथौ पुत्रोऽस्त्ययत्नादपि । कृष्णे नास्ति सुतस्तिथेर्बलवशाद्ब्रूयाद्द्वयोः पक्षयोः दर्शे च्छिद्रतिथौ च विष्टिकरणे न स्यात् स्थिराख्ये सुतः ॥ १५ ॥ अब एक दूसरा प्रकार बताते हैं । सूर्य-स्पष्ट को पांच से गुणा कीजिये और चन्द्र-स्पष्ट को भी पांच से गुणा कीजिए फिर चन्द्र-स्पष्ट को जो पांच से गुणा किया है उसमें से सूर्य-स्पष्ट × ५ के गुणनफल को घटाइये । यह सन्तान तिथि स्फुट हुआ । हमने “सुगम ज्योतिष प्रवेशिका” के पृष्ठ ३८ और ३९ पर यह समझाया है कि सूर्य और चन्द्र के कितने अंश के फ़ासले पर कौन-सी तिथि होती है । तिथि का आधा भाग करण कहलाता है । इस कारण सूर्य और चन्द्र का कितना फ़ासला है यह ज्ञात होने पर करण भी निकाला जा सकता है । ऊपर बताया गया है कि सूर्य-स्पष्ट × ५ के गुणनफल को चन्द्र- स्पष्ट × ५ के गुणनफल में से घटाइये जो उत्तर आवे उससे यह निकालिये कि कौन सी तिथि निकलती है और कौन सा करण आता है । ऊपर लिखे प्रकार से यदि शुक्लपक्ष की शुभ तिथि आवे तो बिना यत्न के भी पुत्र प्राप्ति होती है । यदि कृष्ण पक्ष की तिथि आवे तो संतान की सम्भावना कम रहती है । कृष्णपक्ष की तिथि हो या शुक्लपक्ष की तिथि—शुभ है या नहीं—उसका बलाबल देखकर फल कहना चाहिये । यदि अमावस्या तिथि आवे या छिद्र तिथि आवे तो सन्तान सुख में

२४० फलदीपिका बाधा होगी। इसी प्रकार यह भी देखना चाहिये कि करण कौन सा आता है। यदि विष्टि, चतुष्पाद, नागव, किंस्तुघ्न या शकुन करण आवे तो भी सन्तान सुख में बाधा उत्पन्न होती है। ऊपर बताया गया है कि अमावास्या या छिद्र तिथि आवे तो शुभ फल नहीं समझना। छिद्र तिथि किसे कहते हैं? चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी और चतुर्दशी छिद्र तिथियां कहलाती हैं ॥१५॥ सन्तान दोष परिहार विष्टिः स्थिरं वा करणां यदि स्यात् कृष्णं यजेत् पौरुषसूक्तमन्त्रैः । षष्ठ्यां गुहाराधनमत्र कार्यं यजेच्चतुर्थ्यां किल नागराजम् ॥१६॥ रामायणस्य श्रवणं नवम्यां यद्यष्टमी चेच्छ्रवणव्रतं च । चतुर्दशी चेद्यदि रुद्रपूजा स्याद्द्वादशी चेत्स्मृतमन्नदानम् ॥१७॥ तृप्तिं पितॄणामिह पञ्चदश्यां कृष्णे दशम्याः परतोऽतियत्नात् । पक्षत्रिभागेष्वपि नागराजं स्कन्दं च सेवेत हरिं क्रमेण ॥१८॥ पिछले श्लोक में यह बताया गया है कि उपर्युक्त प्रकार से तिथि और करण निकालने से यदि अनिष्ट तिथि और अनिष्ट करण

बारहवां अध्याय : पुत्रभाव फल २४१ आवे तो सन्तान सुख में बाधा होगी अब इन श्लोकों में उस दोष की शान्ति का उपाय बताते हैं। यदि उपर्युक्त प्रकार से विष्टि,* चतुष्पाद, नागव, किंस्तुघ्न या शकुन करण आवे तो भगवान् कृष्ण का पुरुषसूक्त मन्त्रों से पूजन करे। यदि षष्ठी तिथि आवे तो भगवान् कार्तिक स्वामी का पूजन करना चाहिये। चतुर्थी तिथि आवे तो नागराज (सर्पों के देवता) का पूजन करना चाहिये। नवमी तिथि हो तो रामायण का श्रवण करे और अष्टमी तिथि हो तो श्रवण व्रत करे। यदि चतुर्दशी आवे तो भगवान् रुद्र की पूजा करे और द्वादशी हो तो उसकी शान्ति के लिये अन्नदान श्रेयस्कर है। ओर अमावास्या या पूर्णिमा हो तो पितरों की तृप्ति करे। यदि कृष्णपक्ष की दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी या अमावास्या हो तो और भी विशेष यत्न पूर्वक शान्ति की आवश्यकता है। एक प्रकार से सारे कृष्ण पक्ष को ही अशुभ माना है। और लिखते हैं कि यदि कृष्णपक्ष की पड़वा से पंचमी तक कोई तिथि आवे तो नागराज (सर्पों के देवता) की सेवा करे। यदि कृष्णपक्ष की षष्ठी से दशमी तक कोई तिथि आवे तो भगवान् स्कन्द (कार्तिक स्वामी) की आराधना करे और यदि कृष्णपक्ष की एकादशी से अमावास्या तक कोई तिथि हो तो हरि का भजन-पूजन करे ॥१६, १७, १८॥ पुत्रेशो रिपुनोचगोऽस्तमयगो रिःफाष्टमारिस्थित स्तद्वत्पुत्रगृहस्थितोऽपि यदि वा दुःस्थानपस्तद्वशात् । पुत्राभावनिदानमेव कथयेत् तत्खेचराक्रान्तभ- प्रोक्तैर्दैवतभूरुहैरपि मृगैः सन्तानहेतुं वदेत् ॥१९॥ *विष्टिकरण को भद्रा भी कहते हैं।

२४२ फलदीपिका यदि जन्मकुण्डली में पांचवें घर का स्वामी शत्रु राशि का हो, नीच राशि का हो या अस्त हो और लग्न से छठे, आठवें या बारहवें पड़ा हो तो सन्तान प्राप्ति में बाधा होती है। इसी प्रकार कोई ग्रह नीचराशि का, शत्रुराशि का या अस्त होकर पंचम में बैठा हो या छठे आठवें, बारहवें घर का मालिक होकर पांचवें घर में बैठ जावे तो भी पुत्र का अभाव या पुत्र कष्ट करता है। ऊपर कहे हुए जितने योग अधिक हों उतनी ही अधिक बाधा समझनी चाहिये। बाधाकारक ग्रह जिस राशि में बैठा हो उसके अनुसार यह निर्णय करना चाहिये कि किस देवता, वृक्ष या जीव के कारण बाधा हो रही है और उसकी शान्ति का उपाय करना चाहिये। द्रोहाच्छंभुसुपर्णयोर्नहि सुतः शापात्पितॄणांरवे रिन्दोर्मातृसुवासिनीभगवतीकोपान्मनोदोषतः । स्वग्रामस्थितदेवतागुहरिपुज्यात्युत्थदोषात्कुजे शापाद्बालकृताद्विलालवधतः श्रीविष्णु कोपाद्बुधे ॥२०॥ पारंपर्यसुरप्रियद्विजगुरुद्रोहात्फलाढ्यद्रुम- च्छेदाद्देवगुरौ तथा सति भृगौ पुष्पद्रुमच्छेदनात् । साध्वीगोकुलजातदोषवशतो यक्ष्यादिकामेन वा मन्देऽश्वत्थवधाद्रुषा पितृपतेः प्रेतैः पिशाचादिभिः ॥२१॥ स्वर्भानौ सुतगे सुतेशसहिते सर्पस्य शापात्तथा केतौ ब्राह्मणशापतश्च गुलिके प्रेतोत्थशापं वदेत् । शुक्रेन्दू गुलिकान्वितौ यदि वधूगोहत्तिमाहुः सुते जीवो वाथ शिखी समान्दिरिह चेद्भू देवहत्याऽसुतः ॥२२॥

बारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २४३ यदि सन्तान बाधाकारक ग्रह सूर्य है तो समझना चाहिये कि भगवान् शम्भु और गरुड़ से द्रोह करने के कारण या पितरों के शाप का फल है। यदि सन्तान प्रतिबन्धक ग्रह चन्द्रमा है तो माता या किसी अन्य सधवा स्त्री के चित्त को दुःख पहुँचाने के कारण या भगवती का शाप सन्तान में बाधा हैं। यदि सन्तान प्रतिबन्धक ग्रह मंगल हो तो ग्रामदेवता, भगवान् कार्तिक स्वामी के प्रति अवज्ञा से या शत्रुओं अथवा भाईबन्धुओं के शाप से सन्तान कष्ट है। यदि बुध सन्तान में बाधा डाल रहा है तो समझिये कि बिल्ली को मारने के कारण या मछलियों के या अन्य प्राणियों के अण्डों को नष्ट करने के कारण या कम उम्र के बालक-बालिकाओं के शाप से या भगवान् विष्णु के कोप से सन्तान नहीं हो रही है। यदि जन्म कुण्डली में बृहस्पति बिगड़ा हुआ है और उसके कारण सन्तान नहीं हो रही है तो इस व्यक्ति ने इस जन्म में या पूर्व जन्म में फलदार वृक्षों को कटाया है या अपने कुलगुरु या कुल पुरोहित से द्रोह किया है। यदि शुक्र के कारण सन्तान नहीं हो रही है तो समझिये कि इस व्यक्ति ने पुष्प के वृक्षों को कटवाया है या गौ के प्रति कोई पाप किया है अथवा किसी साध्वी स्त्री के शाप से ऐसा हुआ है। प्रायः ऐसी स्थिति में यक्षिणी का शाप समझना चाहिये। यदि जन्म-कुण्डली में शनि बिगड़ा हुआ है तो समझिये कि इसने पीपल के पेड़ कटवाये और पिशाच, प्रेत तथा यमराज के शाप से ऐसा हुआ है। मृतआत्मा को प्रेत कहते हैं। यदि राहु पंचम में हो या पंचमेश को दूषित करता हो और उसके कारण सन्तान में बाधा हो रही हो तो समझिये कि सर्प के शाप से ऐसा हुआ है। यदि केतु के कारण यह दोष हो तो उसमें हेतु ब्राह्मण का शाप समझना चाहिये। यदि मान्दि पंचम में हो या पंचमेश के साथ हो और इस कारण अपुत्रता हो तो समझिये कि किसी प्रेत के

२४४ फलदीपिका शाप के कारण ऐसा है । यदि शुक्र और चन्द्रमा दोनों मान्दि के साथ हों तो यह समझना चाहिये कि इस व्यक्ति ने किसी गाय या युवती स्त्री की पूर्वजन्म में हत्या की है । किन्तु यदि केतु या बृहस्पति, मान्दि के साथ पंचम में हों तो समझिये कि इसने पूर्व जन्म में किसी ब्राह्मण की हत्या की है ॥२०, २१, २२॥ एवं हि जन्मसमये बहुपूर्वजन्म- कर्मार्जितं दुरितमस्य वदन्ति तज्ज्ञाः । तत्तद्ग्रहोक्तजपदानशुभक्रिया- भिस्तद्दोषशान्तिमिह शंसतु पुत्रसिद्ध्यै ॥२३॥ ' इस प्रकार जन्म-कुण्डली के ग्रहों से यह पता चलता है कि पिछले अनेक जन्मों में इसने क्या-क्या पाप किये जिसके कारण सन्तान हीनता है। पुत्रोत्पत्ति के लिये यह आवश्यक है कि जो-जो ग्रह बाधाकारक हो उस-उस ग्रह के लिए जो-जो जप, दान और शुभ-क्रिया बतायी है वह-वह करे । दोष शान्ति होने से पुत्रोत्पत्ति हो सकती है ॥२३॥ सेतुस्नानं कीर्तनं सत्कथायाः पूजां शंभोः श्रीपतेः सद्‌व्रतानि । दानं श्राद्धं कर्जनागप्रतिष्ठां कुर्यादेतैः प्राप्नुयात्सन्ततिं सः ॥२४॥ ऊपर के श्लोक में उल्लेख आया है कि विविध शुभ क्रिया करे । इस श्लोक में यह बताते हैं कि कौन-कौन सी शुभ-क्रिया करने से सन्तान प्रतिबन्धक दोष की शान्ति होकर पुत्र प्राप्ति हो सकती है :

बारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २४५ सेतुस्नान (समुद्र-स्नान), सत्कथाओं का कीर्तन, शम्भु पूजा, भगवान् विष्णु के व्रत, दान, श्राद्ध, नाग-प्रतिष्ठा (सर्प देवता की मूर्ति की प्रतिष्ठा) आदि को करने से सन्तान प्राप्ति हो सकती है ॥२४॥ लग्नास्तपुत्रपतिजीवदशापहारे पुत्रेशकस्य सुतगस्य च पुत्रसिद्धिः । पुत्रेशराशिमथवा यमकण्टकक्षं जीवेगते तनयसिद्धिरथांशभे वा ॥२५॥ निम्नलिखित ग्रहों में से किसी एक की महादशा, या, अन्तर्दशा हो तो पुत्रोत्पत्ति होती है : (क) लग्नेश (ख) सप्तमेश (ग) पंचमेश (घ) बृहस्पति (ण) जो ग्रह पांचवे घर को देखता है । पंचमेश या यम-कंटक जिस राशि या नवांश में है उससे त्रिकोण में जब गोचरवश बृहस्पति आता है तब भी पुत्रोत्पत्ति हो सकती है ॥२५॥ लग्नाधीशः पुत्रनाथेन योगं स्वोच्चे स्वर्क्षे चारगत्या समेति । पुत्रप्राप्तिः स्यात्तदा लग्ननाथः पुत्रक्षं वायाति धीशाप्तभं वा ॥२६॥ लग्नेश जब गोचरवश (i) पंचमेश से योग करे (ii) अपनी उच्चराशि में आवे (iii) अपनी स्वराशि में आवे तब पुत्रप्राप्ति हो सकती है । यदि लग्नेश गोचरवश पंचम में आवे था पंचमेश जहां स्थित है उस राशि में आवे तो भी सन्तान प्राप्ति के लिये अनुकूल अवसर होता है । ॥ २६ ॥

२४६ फलदीपिका विलग्नकामात्मजनायकानां योगात्समानाय्य दशां महाख्याम् । सुतस्थतद्वीक्षकतत्पतीनां दशापहारेषु सुतोद्भवः स्यात् ॥२७॥ पुत्र प्राप्ति कब होगी यह समय निकालने के लिये एक अन्य प्रकार और बताते हैं । नीचे लिखे तीनों को जोड़िये-- (क) लग्नेश की राशि, अंश, कला, विकला । (ख) सप्तमेश की राशि, अंश, कला, बिकला । (ग) पंचमेश की राशि, अंश, कला, विकला । इनको जोड़ने से जो राशि, अंश, कला, विकला आवे वह किस नक्षत्र के अन्तर्गत पड़ती है यह निकालिये । * इस नक्षत्र के स्वामी को जब महादशा हो और निम्नलिखित में से किमी की अन्तर्दशा हो तो पुत्रोत्पत्ति होती है । (i) पंचम भाव में जो ग्रह हो । (ii) जो ग्रह पंचम को देखता हो । (iii) पंचमेश । सुतपतिगुर्वोरथवा तद्युक्तराश्यंशकाधिपानां वा । बलसहितस्य दशायामपहारे वा सु

बारहवां अध्याय : पुत्रभाव फल २४७ उपर्युक्त में जो बलवान् हो उसकी दशा-अन्तर्दशा में पुत्रोत्पत्ति होती है ।॥२८॥ जीवे तु जीवात्मजनाथभांशक- त्रिकोणगे पुत्रजनिर्भवेन्नृणाम् । अथान्यशास्त्रेण च जन्मकालतो निरूपयेत्सन्ततिलक्षणं बुधः ॥२९॥ पुत्रोत्पत्ति का समय जानने के लिये एक दूसरा प्रकार निम्नलिखित है । यह देखिये कि बृहस्पति से पंचम कौन सा स्थान है । बृहस्पति से पंचम जो राशि हो उसका स्वामी किस राशि और नवांश में है ? उस राशि या नवांश से जब त्रिकोण में गोचरवश बृहस्पति आवे तब पुत्र होगा। यह गोचरवश विचार है। कुछ अन्य शास्त्रों का कथन है कि जन्म कालीन ग्रहों से सन्तान लक्षण बताना चाहिये ।॥२९॥ जन्मनक्षत्रनाथस्य प्रत्ययर्क्षाधिपस्य च । स्फुटयोगं गते जीवे त्रिकोणे वा सुतोद्भवः ॥३०॥ यह देखिये कि चन्द्रमा किस नक्षत्र में है । इस नक्षत्र का स्वामी और इस नक्षत्र से पाँचवें नक्षत्र का स्वामी जो ग्रह हो उनकी राशि अंश, कला, विकला जोड़ लीजिये । जो योग आवे उस राशि, अंश, कला, विकला पर या उससे नवम, पंचम गोचरवश बृहस्पति आवे तब पुत्रोत्पत्ति होगी ।॥३०॥ निषेकलग्नाद्दिनपस्तृतीये राशौ यदा चारवशादुपैति ।

२४८ फलदीपिका आधानलग्नादथवा त्रिकोणे रवौ यदा जन्म वदेन्नराणाम् ॥३१॥ बच्चा किस समय पैदा होगा? (क) जिस राशि में गर्भाधान हुआ है उस राशि से तृतीय में जब गोचर वश सूर्य आवे । (ख) गर्भाधान जिस लग्न से हुआ है उससे पांचवीं या नवीं राशि में जब गोचर वश सूर्य आवे । ॥३१॥ आधानलग्नात्सुतभेशजन्म भाग्येऽपि वा पुण्यवशाच्च वाच्यम् आधानलग्ने शुभदृष्टियोगे दीर्घायुरैश्वर्ययुतो नरः स्यात् ॥३२॥ जिस लग्न में गर्भाधान हुआ है उस लग्न से नवम या पंचम लग्न में यदि जन्म हो तो यह समझना चाहिये कि यह पुण्य कर्म का फल है । यदि आधान लग्न में शुभ-ग्रह बैठे हों या आधान लग्न को शुभ-ग्रह देखते हों तो जो बच्चा पैदा होता है वह दीर्घायु और ऐश्वर्य- शाली होता है । जिस लग्न में गर्भ रहे उसको आधान लग्न कहते हैं । ॥३२॥ तत्कालेन्दुद्वादशांशे मेषात्तावति भेऽपि वा । तस्मात्तावति भे वापि जन्मचन्द्रं वदेद्बुधः ॥३३॥ यह गणित कीजिये कि जब गर्भाधान हुआ है उस समय चन्द्रमा किस राशि और किस द्वादशांश में था । मेष से उतने ही द्वाद-

बारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २४९ शांश गिनने पर जो राशि आवे वह बालक की जन्म राशि होगी। अथवा मेष से गिनने की बजाय गर्भाधान चन्द्र की राशि से गिनिये और इस गिनती से जो राशि आवे वह बालक की जन्म राशि होगी ।॥३३॥ प्रश्नात्मजस्वीकरणोपनोतिकन्याप्रदानाभिनवार्तवेषु । आधानकालेऽपि च जन्मतुल्यं फलं वदेज्जन्मविलग्नतश्च ॥३४॥ जैसे जन्म कुण्डली से सन्तान विचार करना बताया गया है वैसे ही निम्नलिखित समयों में से किसी भी समय की कुण्डली बनाकर यह निर्णय कर सकते हैं कि सन्तान सम्बन्धी क्या भविष्य है। कहने का तात्पर्य यह है कि इस अध्याय में ग्रहों की शुभाशुभता के जो सिद्धान्त बताये गये हैं उन्हें केवल जन्म कुण्डली में ही नहीं अपितु निम्नलिखित कुण्डलियों में भी लागू करना चाहिये :— (i) प्रश्न कुण्डली अर्थात् प्रश्न करने के समय की कुण्डली। (ii) बच्चे को दत्तक पुत्र लेने के समय की कुण्डली । (iii) उपनयन के समय की कुण्डली । (iv) कन्यादान के समय की कुण्डली । (v) जब कन्या को पहली बार रजोदर्शन हो उस समय की कुण्डली । (vi) गर्भाधान के समय की कुण्डली । इन सब कुण्डलियों में लग्न तथा चन्द्र लग्न (चन्द्रमा जिस राशि में हो) दोनों से उसी प्रकार ग्रह स्थिति का विचार करना जैसे जन्म कुण्डली में किया जाता है।

तेरहवां अध्याय आयुर्भाव जाते कुमारे सति पूर्वमार्यै रायुर्विचिन्त्यं हि ततः फलानि । विचारणीया गुणिनि स्थितेतद् गुणाः समस्ताः खलु लक्षणज्ञैः ॥१॥ केचिद्यथाधानविलग्नमन्ये शीर्षोदयं भूपतनं हि केचित् । होराविदश्चेतनकाययोर्न्योर्वियोगकालं कथयन्ति लग्नम् ॥२॥ आद्वादशाब्दान्नरयोनिजन्मना- मायुष्कला निश्चयितुं न शक्यते । मात्रा च पित्रा कृतपापकर्मणा बालग्रहैर्नाशमुपैति बालकः ॥३॥ आद्ये चतुष्के जननीकृताद्यै र्मध्ये च पित्रार्जितपापसङ्घैः । बालस्तदन्त्यासु चतुःशरत्सु स्वकीयदोषैः समुपैति नाशम् ॥४॥ [L

तेरहवाँ अध्याय : आयुर्भाव २५१ जन्म का समय कौन-सा लिया जाय ? कोई तो गर्भाधान के लग्न को ही मुख्य मानते हैं और कुछ लोगों के मत से जब बच्चे का सिर माँ के शरीर से बाहर निकल आवे उस समय को मुख्य मानना चाहिये। कुछ अन्य लोगों का मत है कि जब बालक का पूरा शरीर पृथ्वी पर आ जाय वह समय लेना चाहिये और कुछ अन्य ज्योतिषियों का मत है कि जब नाल काटी जाय तब का समय लेना चाहिये क्योंकि जब तक नाल नहीं कटती तब तक बालक का पृथक् अस्तित्व नहीं होता ॥ २ ॥ बारह वर्ष की अवस्था तक आयु का विचार निश्चय पूर्वक नहीं किया जा सकता। बालक की कुण्डली में आयु योग होने पर भी माता-पिता के किये हुए पाप कर्म से या बालग्रहों के कारण बच्चे की मृत्यु हो जाती है ॥३ ॥ प्रथम चार वर्ष की आयु तक माता के पापों के कारण अपमृत्यु हो जाती है। चार वर्ष से आठ वर्ष तक पिता के पापों के कारण और आठ वर्ष से बारह वर्ष तक बच्चे के अपने पूर्व जन्म के पापों के कारण अपमृत्यु होती है ॥ ४ ॥ तद्दोषशान्त्यै प्रतिजन्मतार- माद्वादशाब्दं जपहोमपूर्वम् । आयुष्यकरं कर्म विधाय ताता बालं चिकित्सादिभिरेव रक्षेत् ॥५॥ अष्टौ बालारिष्टमादौ नराणां योगारिष्टं प्राहुराविंशति स्यात् । अल्पं चाद्वात्रिंशतं मध्यमायु- श्चासप्तत्याः पूर्णमायुः शतान्तम् ॥६॥

२५२ फलदीपिका नॄणां वर्षशतं ह्यायुस्तस्मिंस्त्रेधा विभज्यते । अल्पं मध्यं दीर्घमायुरित्येतत्सर्वसम्मतम् ॥७॥ ऊपर जो दोष बताये गये हैं उनकी शान्ति के लिये प्रतिवर्ष बालक की जन्म तिथि (नक्षत्र) के दिन (चान्द्र मास के हिसाब से) जप होम आदि से शान्ति करे । ऐसा १२ वर्ष की अवस्था तक करना चाहिये । बच्चे के पिता को यह भी उचित है कि चिकित्सा तथा अन्य आयु वृद्धि के साधनों द्वारा बालक की पूरी तौर से रक्षा करे ॥ ५ ॥ जन्म से आठ वर्ष तक बालारिष्ट कहलाता है । आठ वर्ष से बीस वर्ष की अवस्था तक योगारिष्ट । बीस वर्ष से ३२ वर्ष तक अल्पायु कहलाती है । ३२ से ७० तक मध्यायु और ७० से १०० वर्ष तक पूर्णायु ।* ॥ ६ ॥ साधारणतः १०० वर्ष मनुष्य की पूर्णायु मानी गयी है । इसे तीन भागों में विभाजित किया गया है । अल्पायु, मध्यायु और दीर्घायु ॥ ७ ॥ मृत्युः स्याद्दिनमृत्युरुग्विषघटीकालेऽथ तिष्येऽम्बुभे ताताम्बासुतमातुलान्पदवशात्त्वाष्ट्रे च हन्यात्तथा मूलर्क्षे पितृमातृवंशविलयं तस्यान्त्यपादे श्रियं सार्पे व्यस्तमिदं फलं न शुभसम्बन्धं विलग्नं यदि ॥८॥ यदि जन्म "दिनमृत्यु", "दिनरोग" या 'विषघटी काल' में हो तो बच्चा बहुत शीघ्र मर जावेगा ।

  • ग्रहों की ऐसी स्थिति जिससे बच्चे बीमार पड़ते हैं या बच्चों की मृत्यु हो जाती है बालारिष्ट कहलाता है । उदाहरण के लिये क्षीण चन्द्रमा का छठे, आठवें होना । तिथि, वार नक्षत्र, ग्रह आदि के कारण जो योगों से अरिष्ट होते हैं वे योगारिष्ट कहलाते हैं ।

तेरहवाँ अध्याय : आयुर्भाव २५३ दिन मृत्यु—दिन मृत्यु किसे कहते हैं?—धनिष्ठा और हस्त का प्रथम चरण; विशाखा और आर्द्रा का द्वितीय चरण; उत्तराभाद्रपद और आश्लेषा का तृतीयचरण तथा भरणी और मूल का चतुर्थ चरण हो और दिन का समय हो तो दिन मृत्यु योग होता है। यदि रात्रि में जन्म हो तो दोष नहीं होता। दिनरोग—आश्लेषा और उत्तराभाद्रपद का प्रथम चरण, भरणी और मूल का द्वितीय चरण; उत्तरा फाल्गुनी और श्रवण का तृतीय चरण, तथा स्वाती और मृगशिर् का चतुर्थ चरण यदि दिन के समय हो तो 'दिनरोग' कहलाता है। यदि रात्रि में जन्म हो तो दोष नहीं होता। "विष घटी"—प्रत्येक नक्षत्र में चार घड़ी का समय विषघटी काल होता है। यह नीचे दिया जाता है। अश्विनी ५०-५४; भरणी २४-२८; कृत्तिका ३०-३४; रोहिणी ४०-४४; मृगशिर् १४-१८, आर्द्रा २१-२५ पुनर्वसु ३०-३४; पुष्य २०-२४; आश्लेषा ३२-३६; मघा ३०-३४; पूर्वाफाल्गुनी २०-२४; उत्तरा फाल्गुनी १८-२२; हस्त २१-२५; चित्रा २०-२४; स्वाती १४-१८; विशाखा १४-१८ अनुराधा १०-१४ ज्येष्ठा १४-१८ मूल ५६-६०; पूर्वाषाढ़ २४-२८; उत्तराषाढ़ २०-२४; श्रवण १०-१४; धनिष्ठा १०-१४; शतभिषा १८-२२; पूर्वाभाद्र १६-२०; उत्तराभाद्र २४-२८; रेवती ३०-३४। अश्विनी नक्षत्र के ५० घड़ी बीत जाने पर ४ घड़ी काल—अर्थात् ५४वीं घड़ी समाप्त होने तक विषघटी काल समझा जाता है। इसी प्रकार सर्वत्र समझना चाहिये। यदि पुष्य, पूर्वाषाढ़ और चित्रा के प्रथम चरण में जन्म हो तो बालक के पिता की मृत्यु हो; यदि द्वितीय चरण में जन्म हो तो माता की; यदि तृतीय चरण में हो तो बच्चे की स्वयं की और यदि चतुर्थ में