भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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२४२ फलदीपिका यदि जन्मकुण्डली में पांचवें घर का स्वामी शत्रु राशि का हो, नीच राशि का हो या अस्त हो और लग्न से छठे, आठवें या बारहवें पड़ा हो तो सन्तान प्राप्ति में बाधा होती है। इसी प्रकार कोई ग्रह नीचराशि का, शत्रुराशि का या अस्त होकर पंचम में बैठा हो या छठे आठवें, बारहवें घर का मालिक होकर पांचवें घर में बैठ जावे तो भी पुत्र का अभाव या पुत्र कष्ट करता है। ऊपर कहे हुए जितने योग अधिक हों उतनी ही अधिक बाधा समझनी चाहिये। बाधाकारक ग्रह जिस राशि में बैठा हो उसके अनुसार यह निर्णय करना चाहिये कि किस देवता, वृक्ष या जीव के कारण बाधा हो रही है और उसकी शान्ति का उपाय करना चाहिये। द्रोहाच्छंभुसुपर्णयोर्नहि सुतः शापात्पितॄणांरवे रिन्दोर्मातृसुवासिनीभगवतीकोपान्मनोदोषतः । स्वग्रामस्थितदेवतागुहरिपुज्यात्युत्थदोषात्कुजे शापाद्बालकृताद्विलालवधतः श्रीविष्णु कोपाद्बुधे ॥२०॥ पारंपर्यसुरप्रियद्विजगुरुद्रोहात्फलाढ्यद्रुम- च्छेदाद्देवगुरौ तथा सति भृगौ पुष्पद्रुमच्छेदनात् । साध्वीगोकुलजातदोषवशतो यक्ष्यादिकामेन वा मन्देऽश्वत्थवधाद्रुषा पितृपतेः प्रेतैः पिशाचादिभिः ॥२१॥ स्वर्भानौ सुतगे सुतेशसहिते सर्पस्य शापात्तथा केतौ ब्राह्मणशापतश्च गुलिके प्रेतोत्थशापं वदेत् । शुक्रेन्दू गुलिकान्वितौ यदि वधूगोहत्तिमाहुः सुते जीवो वाथ शिखी समान्दिरिह चेद्भू देवहत्याऽसुतः ॥२२॥