भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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बारहवां अध्याय : पुत्रभाव फल २४१ आवे तो सन्तान सुख में बाधा होगी अब इन श्लोकों में उस दोष की शान्ति का उपाय बताते हैं। यदि उपर्युक्त प्रकार से विष्टि,* चतुष्पाद, नागव, किंस्तुघ्न या शकुन करण आवे तो भगवान् कृष्ण का पुरुषसूक्त मन्त्रों से पूजन करे। यदि षष्ठी तिथि आवे तो भगवान् कार्तिक स्वामी का पूजन करना चाहिये। चतुर्थी तिथि आवे तो नागराज (सर्पों के देवता) का पूजन करना चाहिये। नवमी तिथि हो तो रामायण का श्रवण करे और अष्टमी तिथि हो तो श्रवण व्रत करे। यदि चतुर्दशी आवे तो भगवान् रुद्र की पूजा करे और द्वादशी हो तो उसकी शान्ति के लिये अन्नदान श्रेयस्कर है। ओर अमावास्या या पूर्णिमा हो तो पितरों की तृप्ति करे। यदि कृष्णपक्ष की दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी या अमावास्या हो तो और भी विशेष यत्न पूर्वक शान्ति की आवश्यकता है। एक प्रकार से सारे कृष्ण पक्ष को ही अशुभ माना है। और लिखते हैं कि यदि कृष्णपक्ष की पड़वा से पंचमी तक कोई तिथि आवे तो नागराज (सर्पों के देवता) की सेवा करे। यदि कृष्णपक्ष की षष्ठी से दशमी तक कोई तिथि आवे तो भगवान् स्कन्द (कार्तिक स्वामी) की आराधना करे और यदि कृष्णपक्ष की एकादशी से अमावास्या तक कोई तिथि हो तो हरि का भजन-पूजन करे ॥१६, १७, १८॥ पुत्रेशो रिपुनोचगोऽस्तमयगो रिःफाष्टमारिस्थित स्तद्वत्पुत्रगृहस्थितोऽपि यदि वा दुःस्थानपस्तद्वशात् । पुत्राभावनिदानमेव कथयेत् तत्खेचराक्रान्तभ- प्रोक्तैर्दैवतभूरुहैरपि मृगैः सन्तानहेतुं वदेत् ॥१९॥ *विष्टिकरण को भद्रा भी कहते हैं।