फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० फलदीपिका बाधा होगी। इसी प्रकार यह भी देखना चाहिये कि करण कौन सा आता है। यदि विष्टि, चतुष्पाद, नागव, किंस्तुघ्न या शकुन करण आवे तो भी सन्तान सुख में बाधा उत्पन्न होती है। ऊपर बताया गया है कि अमावास्या या छिद्र तिथि आवे तो शुभ फल नहीं समझना। छिद्र तिथि किसे कहते हैं? चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी और चतुर्दशी छिद्र तिथियां कहलाती हैं ॥१५॥ सन्तान दोष परिहार विष्टिः स्थिरं वा करणां यदि स्यात् कृष्णं यजेत् पौरुषसूक्तमन्त्रैः । षष्ठ्यां गुहाराधनमत्र कार्यं यजेच्चतुर्थ्यां किल नागराजम् ॥१६॥ रामायणस्य श्रवणं नवम्यां यद्यष्टमी चेच्छ्रवणव्रतं च । चतुर्दशी चेद्यदि रुद्रपूजा स्याद्द्वादशी चेत्स्मृतमन्नदानम् ॥१७॥ तृप्तिं पितॄणामिह पञ्चदश्यां कृष्णे दशम्याः परतोऽतियत्नात् । पक्षत्रिभागेष्वपि नागराजं स्कन्दं च सेवेत हरिं क्रमेण ॥१८॥ पिछले श्लोक में यह बताया गया है कि उपर्युक्त प्रकार से तिथि और करण निकालने से यदि अनिष्ट तिथि और अनिष्ट करण