फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 240, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २३९ तीनों ग्रहों की राशि, अंश, कला, विकला जोड़िये) जो जोड़ आवे वह यदि सम राशि, सम नवांश में हो तो उस स्त्री में सन्तान उत्पन्न करने की पूर्ण क्षमता समझनी चाहिए। राशि और नवांश इन दोनों में एक सम, एक विषम आवे तो आधी क्षमता और दोनों विषम आवें तो पूर्ण अक्षमता समझनी चाहिये ॥१४॥ पञ्चाघ्नाच्छशिनः स्फुटादिषुहतं भानुस्फुटं शोधये- न्नीत्वा तत्र तिथिं सिते शुभतिथौ पुत्रोऽस्त्ययत्नादपि । कृष्णे नास्ति सुतस्तिथेर्बलवशाद्ब्रूयाद्द्वयोः पक्षयोः दर्शे च्छिद्रतिथौ च विष्टिकरणे न स्यात् स्थिराख्ये सुतः ॥ १५ ॥ अब एक दूसरा प्रकार बताते हैं । सूर्य-स्पष्ट को पांच से गुणा कीजिये और चन्द्र-स्पष्ट को भी पांच से गुणा कीजिए फिर चन्द्र-स्पष्ट को जो पांच से गुणा किया है उसमें से सूर्य-स्पष्ट × ५ के गुणनफल को घटाइये । यह सन्तान तिथि स्फुट हुआ । हमने “सुगम ज्योतिष प्रवेशिका” के पृष्ठ ३८ और ३९ पर यह समझाया है कि सूर्य और चन्द्र के कितने अंश के फ़ासले पर कौन-सी तिथि होती है । तिथि का आधा भाग करण कहलाता है । इस कारण सूर्य और चन्द्र का कितना फ़ासला है यह ज्ञात होने पर करण भी निकाला जा सकता है । ऊपर बताया गया है कि सूर्य-स्पष्ट × ५ के गुणनफल को चन्द्र- स्पष्ट × ५ के गुणनफल में से घटाइये जो उत्तर आवे उससे यह निकालिये कि कौन सी तिथि निकलती है और कौन सा करण आता है । ऊपर लिखे प्रकार से यदि शुक्लपक्ष की शुभ तिथि आवे तो बिना यत्न के भी पुत्र प्राप्ति होती है । यदि कृष्ण पक्ष की तिथि आवे तो संतान की सम्भावना कम रहती है । कृष्णपक्ष की तिथि हो या शुक्लपक्ष की तिथि—शुभ है या नहीं—उसका बलाबल देखकर फल कहना चाहिये । यदि अमावस्या तिथि आवे या छिद्र तिथि आवे तो सन्तान सुख में