फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २४५ सेतुस्नान (समुद्र-स्नान), सत्कथाओं का कीर्तन, शम्भु पूजा, भगवान् विष्णु के व्रत, दान, श्राद्ध, नाग-प्रतिष्ठा (सर्प देवता की मूर्ति की प्रतिष्ठा) आदि को करने से सन्तान प्राप्ति हो सकती है ॥२४॥ लग्नास्तपुत्रपतिजीवदशापहारे पुत्रेशकस्य सुतगस्य च पुत्रसिद्धिः । पुत्रेशराशिमथवा यमकण्टकक्षं जीवेगते तनयसिद्धिरथांशभे वा ॥२५॥ निम्नलिखित ग्रहों में से किसी एक की महादशा, या, अन्तर्दशा हो तो पुत्रोत्पत्ति होती है : (क) लग्नेश (ख) सप्तमेश (ग) पंचमेश (घ) बृहस्पति (ण) जो ग्रह पांचवे घर को देखता है । पंचमेश या यम-कंटक जिस राशि या नवांश में है उससे त्रिकोण में जब गोचरवश बृहस्पति आता है तब भी पुत्रोत्पत्ति हो सकती है ॥२५॥ लग्नाधीशः पुत्रनाथेन योगं स्वोच्चे स्वर्क्षे चारगत्या समेति । पुत्रप्राप्तिः स्यात्तदा लग्ननाथः पुत्रक्षं वायाति धीशाप्तभं वा ॥२६॥ लग्नेश जब गोचरवश (i) पंचमेश से योग करे (ii) अपनी उच्चराशि में आवे (iii) अपनी स्वराशि में आवे तब पुत्रप्राप्ति हो सकती है । यदि लग्नेश गोचरवश पंचम में आवे था पंचमेश जहां स्थित है उस राशि में आवे तो भी सन्तान प्राप्ति के लिये अनुकूल अवसर होता है । ॥ २६ ॥